राजस्थान के संत समाचार

राजस्थान के जैन संत 22 भट्टारक श्री जिनचंद्र जी साहित्य और संस्कृति का करते थे प्रचार: ऐतिहासिक लेख में है जिनचंद्र की का यशोगान


राजस्थान के जैन संत श्रंखला में श्रीफल जैन न्यूज की ओर से आज भट्टारक जिनचंद्र जी को परिचित करवा रहे हैं। भट्टारक जिनचंद्रजी राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब, देहली प्रदेश विहार करते थे। जनता को वास्तविक धर्म का उपदेश देते थे। प्राचीन ग्रंथों की नई-नई प्रतियां लिखवाकर मंदिरों में विराजमान करवाते थे। नए-नए ग्रंथों का स्वयं निर्माण करते तथा दूसरों को प्रेरित करते। मंदिरों का जीर्णोद्धार तथा जगह-जगह नई-नई प्रतिष्ठाएं करवाकर जैन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते थे। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 22वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री जिनचंद्र के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..


इंदौर। भट्टारक जिनचंद्र जी 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध भट्टारक एवं जैन संत थे। भारत की राजधानी दिल्ली में भट्टारकों की प्रतिष्ठा बढ़ाने में इनका प्रमुख योगदान रहा था। यद्यपि दिल्ली में ही इनकी भट्टारक गादी थी, लेकिन वहां से ही ये पूरे राजस्थान में भ्रमण करते और साहित्य और संस्कृति का प्रचार करते। इनके गुरु का नाम भट्टारक शुभचंद्रजी था और उन्हीं की समाधिमरण के बाद संवत 1507 की ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी को इनका पट्टाभिषेक हुआ। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार इन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही घर-बार छोड़ दिया था और भट्टारक शुभचंद्र जी के शिष्य बन गए। 15 वर्ष तक इन्होंने शास्त्रों का खूब अध्ययन किया। भाषण देने और वाद-विवाद करने की कला सीखी तथा 27 वें वर्ष में इन्हें भट्टारक पद पर आरूढ़ कर दिया गया। भट्टारक जिनचंद्र जी 64 वर्ष तक इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन रहे। इतने लंब समय तक भट्टारक पद पर रहना बहुत कम संतों को मिल सका। ये जाति से बघेरवाल श्रावक थे। जिनचंद्र जी राजस्थान उत्तरप्रदेश, पंजाब, देहली प्रदेश विहार करते। जनता को वास्तविक धर्म का उपदेश देते। प्राचीन ग्रंथों की नई-नई प्रतियां लिखवाकर मंदिरों में विराजमान करवाते। नए-नए ग्रंथों का स्वयं निर्माण करते तथा दूसरों को भी इस ओर प्रेरित करते। पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाते तथा जगह-जगह पर नई-नई प्र्रतिष्ठाएं करवाकर जैन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते। आज राजस्थान के प्रत्येक दिगंबर जैन मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित एक-दो मूर्तियां अवश्य मिलेंगी। संवत 1648 में जीवराज पापड़ीवाल ने जो बड़ी प्रतिष्ठा करवाई थी। वह सब इनके द्वारा ही संपन्न हुई थी। उस प्रतिष्ठा में सैकड़ों ही नहीं हजारों मूर्तियां प्रतिष्ठापित करवाकर क राजस्थान के अधिकांश मंदिरों में विराजमान करवाई गई थीं। आवां टोंक राजस्थान में एक मील पश्चिम की ओर एक छोटी सी पहाड़ी पर नसिया है। इसमें भट्टारक शुभचंद्र, जिनचंद्र और प्रभाचंद्र जी की निषेधकाएं स्थापित हैं। ये तीनों निषेधकाएं संवत 1593 ज्येष्ठ सुदी तृतीया सोमवार के दिन भट्टारक प्रभाचंद्र के शिष्य मंडलाचार्य धर्मचंद्र ने साह कालू एवं उनके चार पुत्र और पोत्रों द्वारा स्थापित करवाई थी। इसी समय आवां में एक बड़ी प्रतिष्ठा भी हुई थी। जिसका ऐतिहासिक लेख वहीं के शांतिनाथ मंदिर में लगा हुआ है। लेख संस्कृत में है और उसमें भट्टारक जिनचंद्र जी का यशोगान है।

भट्टारक जिनचंद्र जी साहित्य में योगदान

जिनचंद्र का प्राचीन ग्रंथों का नवीनीकरण की ओर विशेष ध्यान था। इसलिए इनके द्वारा लिखवाई गई कितनी ही हस्तलिखित प्रतियां जैन शास्त्र भंडारों में उपलब्ध होती हैं। संवत 1512 की आषाढ़ कृष्ण 12 को नेमिनाथ चरित की एक प्रति लिखी गई थी। जिसे इन्हें घोघा बंदरगाह में नयनंदी मुनिश्री ने समर्पित की थी। संवत 1515 में नैणवा नगर में इनके शिष्य अनंतकीर्ति द्वारा नरसेनदेव की सिद्धचक्रकथा अपभ्रंश की प्रतिलिपि श्रावक नारायण के पठनार्थ करवाई। इसी तरह संवत 1521 में ग्वालियर में परमचरित्र की प्रतिलिपि करवाकर नेत्रनंदी मुनि को अर्पण की गई।

साहित्य रचना और जिनचंद्रजी के शिष्य 

संवत 1558 की श्रावण शुक्ल 12 को इनकी आम्नाय में ग्वालियर में महाराज मानसिंह के शासन काल में नागकुमार चरित की प्रति लिखवाई गई। इसकी प्रति को संवत 1516 में झुझुनु में साह पार्श्व के पुत्रों ने श्रुत पंचमी उद्यापन पर लिखवाई थी। संवत 1517 में झुझुनु में ही तिलोयपणति की प्रति लिखवाई गई थी। पंडित मेधावी इनका एक प्रमुख शिष्य था, जो साहित्य रचना में विशेष रुचि रखता था। इन्होंने नागौर में धर्म संग्रह श्रावकाचार की संवत 1541 में रचना समाप्त की थी। भट्टारक जिनचंद्र के शिष्यों में रत्नकीर्ति, सिंहकीर्ति, प्रभाचंद्र, जगतकीर्ति, चारूकीर्ति, जयकीर्ति, भीमसेन, मेधावी के नाम उल्लेखनीय है। रत्नकीर्ति ने संवत 1572 में नागौर में भट्टारक गादी स्थापित की तथा सिंह कीर्ति ने अटेर में स्वतंत्र भट्टारक गादी की स्थापना की। इस प्रकार भट्टारक जिनचंद्र ने अपने समय में साहित्य एवं पुरातत्व की जो सेवा की थी। वह सदा ही स्वर्णाक्षरों में लिपिबद्ध रहेगी।

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