राजस्थान के जैन संतों ने जहां जैन धर्म के लिए अपने गुरुओं के साथ समाज को चैतन्य किया वहीं अपने साहित्य, काव्य, दोहों और छंद के माध्यम से जनजागरण किया। जिन भक्ति के लिए प्रेरित किया। संतों ने जहां दिगंबर जैन मंदिरों में प्रतिमाओं की प्रतिष्ठाएं खूब करवाईं। इन्हीं में से एक संत हैं भट्टारक भुवनकीर्ति। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 21वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री भुवनकीर्ति के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। संत भुवनकीर्ति विविध शास्त्रों के ज्ञाता एवं प्राकृत, संस्कृत तथा राजस्थानी के प्रबल विद्वान थे। शास्त्रार्थ करने में वे अति चतुर थे। वे संपूर्ण कलाओं में पारंगत और पूर्ण अहिसंक थे। जिधर भी आपका विहार होता था, वहां उनका अपूर्व स्वागत होता। ब्रह्म जिनदास के शब्दों में इनकी कीर्ति विश्व विख्यात हो गई थी। वे अनेक साधुओं के अधिपति एवं मुक्ति मार्ग उपदेष्टा थे। विद्वानों से पूजनीय एवं पूर्ण संयमी थे। ये अनेक काव्यों के रचियता एवं उत्कृष्ट गुणों के मंदिर थे। ब्रह्म जिनदास ने अपने रामचरित्र काव्य में इन्हीं भट्टारक भुवनकीर्ति का गुणानुवाद करते हुए लिखा है कि वे अगाध ज्ञान के वेत्ता तथा कामदेव को चूर्ण करने वाले थे। संसार पाश को त्यागने वाले एवं स्वच्छ गुणों के धारक थे। अनेक साधुओं के पूजनीय होने से वे यतिराज कहलाते थे। भुवनकीर्ति के बाद होने वाले सभी भट्टारकों ने इनका विविध रूप से गुणानुवाद किया गया है। इनके व्यक्तित्व एवं पांडित्य से सभी प्रभावित थे। भट्टारक शुभचंद्र जी ने इनका स्मरण किया है। भुवनकीर्ति पहले मुनि रहे और भट्टारक सकलकीर्ति की समाधि के किसी समय भट्टारक बने। भट्टारक बनने के बाद इनके पांडित्य एवं तपस्या की चर्चा चारों ओर फैल गई। इन्होंने अपने जीवन का प्रधान लक्ष्य जनता को सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दृष्टि से जाग्रत करने का बनाया और इसमें उन्हें पर्याप्त सफलता मिली। इन्होंने अपने शिष्यों को उत्कृष्ट विद्वान एवं साहित्य सेवी के रूप में तैयार किया। भट्टारक भुवनकीर्ति की अब तक जितनी रचनाएं उपलब्ध हुई हैं।
चतुर्विंशति प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई गई
इनकी रचनाओं में जीवंधर रास, जंबुस्वामी रास अंजना चरित्र आपकी उत्तम रचनाएं हैं। साहित्य रचना के अतिरिक्त इन्होंने कितने ही स्थानों पर प्रतिष्ठा विधान करवाए तथा प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। संवत 1511 में इनके उपदेश से हुंबड जातीय श्रावक करमण एवं उसके परिवार ने चौबीसी की प्रतिमा (मूल नायक प्रतिमा शांतिनाथ स्वामी) स्थापित की थी। संवत 1513 में इनकी देखरेख में चतुर्विंशति प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई गई। संवत 1515 में गंधारपुर में प्रतिष्ठा संपन्न हुई तथा फिर इन्हीं के उपदेश से जूनागढ़ में एक शिखर वाले मंदिर का निर्माण करवाया गया। इसमें धातु (पीतल) की आदिनाथ की प्रतिमा की स्थापना की गई। इस उत्सव में सौराष्ट्र के छोटे बड़े राजा-महाराजा भी सम्मिलित हुए थे। भट्टारक भुवनकीर्ति इसमें मुख्य अतिथि थे। संवत 1525 में नागद्रहा ज्ञातीय श्रावक पूजा एवं उसके परिवार वालों ने इन्हीं के उपदेश से आदिनाथ स्वामी की धातु की प्रतिमा स्थापित की। संवत 1527 वैशाख बुदि 11 को आपने एक और प्रतिष्ठा करवाई। इस अवसर पर हुंबड जातीय जयसिंह आदि श्रावकों ने धातु की रत्नत्रय चौबीसी की प्रतिष्ठा करवाई।













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