नगर में पंचकल्याणक महामहोत्सव के चतुर्थ दिवस पर तपकल्याणक के महत्व को प्रतिपादित करते हुए मुनिश्री 108 विनय सागर जी महामुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ही एक ऐसा संस्कृति है। भिंड से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…
भिंड। नगर में पंचकल्याणक महामहोत्सव के चतुर्थ दिवस पर तपकल्याणक के महत्व को प्रतिपादित करते हुए मुनिश्री 108 विनय सागर जी महामुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ही एक ऐसा संस्कृति है, जो व्यक्ति के सामने दो लक्ष्य रखती है। इस संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति अकर्मठ से कर्मठ बनाने की बात कहती है। पुरुष को समीचीन पुरुषार्थ में लगती है। यदि कोई पुरुष, पुरुषार्थ करने से मुख मोड़ता उसे फिर का पुरुष नहीं कहा जाता है। ऐसी संस्कृति जो व्यक्ति को जीवन जीने के लिए जो दो लक्ष्य रखती है वो है कृषि करो या ऋषि बनो। मुनिश्री ने कहा कि भारत ही एक ऐसा देश है जो मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश है। कृषि करके व्यक्ति सांसारिक जीवन में रहकर अपने जीवन का निर्वाह करता है। इसी संस्कृति की दूसरी जो धारा है वह ऋषि बनने की रही है। ऋषि परंपरा भारत की आज की नहीं युग के आदि से यह परंपरा आई।
ऋषि हो मुनि हो, यति हो और साधु कहों सबका एक ही अर्थ है
भगवान आदिनाथ ने अपने सांसारिक जीवन को त्यागकर आत्मिक जीवन की ओर मुख मोड़ा था। संसार की असारता को जानकर सार भूत तत्व को जाना था। यानि ऋषि परंपरा को इस कर्मभूमि पर लोगों को बतलाया था। ऋषि वह होता है जिसके भावों में हमेशा ऋजुता हुआ करती है। व्यक्ति जीवन में कषाय भाव के कारण कटुता उत्पन्न होती है लेकिन कषायों का जब शमन होता है तब उसे ऋषि बनने की पात्रता प्राप्त होती है। मुनिश्री ने कहा कि ऋषि हो मुनि हो, यति हो और साधु कहों सबका एक ही अर्थ है। एक मुनि के जीवन में और सामान्य व्यक्ति के जीवन में बहुत अंतर होता है। गृहस्थ का जीवन कषायों से संतृप्त रहता है पर साधु का जीवन कषायों को तपाने में लगा रहता है और अपने आत्मिक सुख में लीन रहता है। बाहरी की गरमी भी वह शीतलता का अनुभव करता है। क्यों? क्योंकि आत्मा की शीतलता ही सबसे बड़ी शीतलता है आत्मिक विकास ही सबसे बड़ा विकास है।
नीलांजना का नृत्य ही वैराग्य का कारण बना,
ऐसे विकास का पथ दिखाने वाले भगवान आदिनाथ ने संसार की असारता को जाना राग रंग में सजी हुई राज्य सभा में नीलांजना का नृत्य ही वैराग्य का कारण बना, जो स्वर्ग की सबसे सुन्दर नर्तकी थी जिसका मरण ही संसार की असारता का दर्शन करा गया, वैराग्य की ओर ले गया, अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को अपना राजपाट देकर सांसारिक वैभव का त्याग कर पंच मुष्ठि केश लोंच कर निर्ग्रन्थ दीक्षा को ग्रहण किया। यह अंतिम दीक्षा लेकर संसार का अंत करने का कदम और अनंत की ओर कदम बढ़ाने का कार्य कराने वाला यह कल्याणक होता है।
तप कल्याणक पर विभिन्न कार्यक्रम किए
मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित पंचकल्याणक महामहोत्सव पर शनिवार को तप कल्याणक पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। युवराज आदिकुमार के विवाह के उपलक्ष्य में नीलांजना नृत्य की मनोरम प्रस्तुति की गई। नृत्य के दौरान नीलांजना के मरण के दृश्य को देख युवराज आदिकुमार को वैराग्य उत्पन्न हो गया। वह राजपाट छोड़ वन को विहार कर गए। विधि नायक जिनबिम्ब, भावी तीर्थंकर प्रभु को पिच्छी कमंडल भेट पुण्यार्जक परिवार, प्रमोद कुमार जैन, वीना जैन दीपाली जैन, अर्पित जैन लोहिया द्वारा किया गया। भरत बाहुबली का राज्य तिलक किया गया। इस अवसर पर आदिनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव समिति के सदस्यगण सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित थे।













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