उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए धर्म निष्ठ, विनयवान और सदगृहस्थ बनकर ढोंग का नहीं ढंग का जीवन जीने की प्रेरणा दी और कुछ ऐसे सूत्र दिए जिन्हें आत्मसात कर व्यक्ति घर, परिवार और समाज में आदर्श जीवन जी सकता है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए धर्म निष्ठ, विनयवान और सदगृहस्थ बनकर ढोंग का नहीं ढंग का जीवन जीने की प्रेरणा दी और कुछ ऐसे सूत्र दिए जिन्हें आत्मसात कर व्यक्ति घर, परिवार और समाज में आदर्श जीवन जी सकता है। माताजी ने कहा कि विनय मोक्ष का द्वार है और विनय से ही केवल ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। आगम ग्रंथों का स्वाध्याय जब भी करें, एकाग्र चित्त होकर विनय पूर्वक करें। अविनय से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है।
मंत्रों का महत्व बताते हुए माताजी ने कहा कि मंत्रों के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है। इसलिए मंत्रों का उच्चारण शुद्ध करना चाहिए। घर-परिवार में सुख- शांति रहे, इसके लिए माताजी ने प्रेरणा दी कि घर का कोई भी सदस्य अपना स्वामित्व ना दिखाए और घर में सब के साथ समान व्यवहार करें। घर में पति पत्नी दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित भाव से सहयोग करें।
जिस घर में पति दादागिरी दिखाए, उस घर में सुख शांति नहीं हो सकती। बच्चों को भी न डराएं, न उनके साथ मारपीट करें बल्कि मौन पूर्वक शांति से उन्हें समझाएं और संस्कारित करें। अंत में माताजी ने कहा कि श्रावक धर्म कोई छोटा धर्म नहीं है। यह परंपरा से मोक्ष दिलाने वाला है। नदी के दो तट हैं एक श्रावक धर्म और एक मुनि धर्म। जब दोनों तट मजबूत होंगे तभी धर्म की नदी गंतव्य तक पहुंच सकेगी।













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