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पीएम मित्र पार्क के जरिये इतिहास दोहराएगा बदनावर वर्द्धमानपुर : ऐतिहासिकता के सहारे वैश्विक बनने की तैयारी 


कहते हैं कि समय बीतता है और इतिहास पुनः अपने आप को दोहराता है। हम यहां बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा धार जिले के ऐतिहासिक नगर वर्द्धमानपुर बदनावर के भैंसोला ग्राम में पीएम मित्र पार्क के उद्घाटन अवसर की। बुधवार को लिखा जाएगा इतिहास। इसके दुबारा हम सब बनेंगे साक्षी। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर…


इंदौर/बदनावर। कहते हैं कि समय बीतता है और इतिहास पुनः अपने आप को दोहराता है। हम यहां बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा धार जिले के ऐतिहासिक नगर वर्द्धमानपुर बदनावर के भैंसोला ग्राम में पीएम मित्र पार्क के उद्घाटन अवसर की। बुधवार को लिखा जाएगा इतिहास। इसके दुबारा हम सब बनेंगे साक्षी। संयोगवश बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी का जन्म दिवस भी है। एक समय था जब मध्य प्रदेश में बदनावर नगर का नाम कपास उत्पादन क्षेत्र में गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराता रहा था। इस नगर के नाम से बदनावर नंबर वन कपास का बीज इजाद किया गया था। यहां की फर्म नंदराम जवाहर लाल जिनिंग फेक्ट्री प्रदेश में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। लगभग 80-90 वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका में रही नंदराम जवहरीलाल जीनिगं फैक्ट्री के साथ ही लालचंद वल्लभराज अग्रवाल जीनिगं फैक्ट्री, मार्केटिंग सोसायटी, गोपाल कॉटन, सिंगोली वाली जीनिगं फैक्ट्री और तिरुपति जीनिगं फैक्ट्री ने बदनावर में कपास व्यवसाय में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बदनावर में कपास अनुसंधान केंद्र में कार्यरत वैज्ञानिक परमार साहब ने बदनावर नंबर वन बीज पर अनुसंधान करके इसे विश्वव्यापी बनाया। वरिष्ठ समाजसेवी पवन भड़तक्या बताते हैं कि नगर में तैयार किए गए बीज को शासन द्वारा खरीदा जाता था। वहीं बदनावर की ख्याति यहां पर कपास की गाड़ियां लेकर आने वाले किसानों को किए जाने वाले नगदी पेमेंट के रूप में थी। इसी वजह से महाराष्ट्र और गुजरात तक का माल बदनावर मंडी में आता था। वही यहां की मंडी में तोल की गारंटी हुआ करती थी यह विश्वास ही दूर-दूर से किसानों को यहा तक खींचकर लाता था।

काटन किंग सर सेठ हुकुमचंद की धाक लंदन तक थी 

यूं देखा जाए तो मध्य प्रदेश कपास उत्पादन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता रहा है। प्रदेश में लगभग 18 जिलों की भूमि पर कपास उत्पादन किया जाता है। जानकारी के अनुसार करीब 6 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में हर साल लगभग 24 लाख टन कपास पैदा होता है। वहीं देश में जितना ऑर्गेनिक कॉटन पैदा होता है। उसका बहुत बड़ा हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश से आता है। यही वजह है कि वस्त्र उद्योग के लिए मध्य प्रदेश सबसे उपयुक्त क्षेत्र साबित हुआ है। जिसका एक सशक्त उदाहरण अंग्रेजों के जमाने की इंदौर की कपड़ा मिले थी जो एक समय में काटन किंग सर सेठ हुकुमचंद के माध्यम से संपूर्ण भारत ही नहीं लंदन तक अपनी धाक जमाए हुए थी। इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों पर दृष्टिपात किया जाए तो हम पाएंगे कि धार जिले का पीएम मित्र पार्क उस गौरवमई इतिहास का सुपरिणाम है।

ऐतिहासिक से वैश्विक की ओर बढ़ते कदम 

वर्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी, राजेश जैन और स्वप्निल जैन आदि सदस्य बताते हैं कि बदनावर पुरातन नाम वर्द्धमानपुर एक समय धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से सम्पूर्ण भारत वर्ष में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। उस वर्द्धमानपुर नगरी में समृद्धि (लक्ष्मी) अपनी सखी सरस्वती के साथ सदियों तक निवास करती थी। जैसा कि यहां रचे गए धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। जैसा कि हम जानते हैं कि हर समय एक सा नहीं होता। उसमें परिवर्तन होना स्वाभाविक है और यही युक्ति प्राचीन वर्द्धमानपुर के साथ भी चरितार्थ हुई समय बदला। आक्रांताओं ने संपूर्ण धार्मिक सामाजिक सांस्कृतिक और व्यापारिक वैभवशाली इतिहास को धराशायी कर दिया। यहां तक कि नाम भी गुमनामी की गर्त में खो गया। एक समय ऐसा भी था जब यह समृद्ध नगर एक छोटे-से गांव टप्पे जैसी स्थिति में भी नहीं रहा।

ऐतिहासिक वर्द्धमानपुर अपनी वैश्विक पहचान बनाने की ओर अग्रसर

यह हजार वर्ष की गुमनामी का दाग़ स्वतंत्रता प्राप्ति के महज तीन-चार साल बाद ही मिटना शुरू हुआ। जब वर्ष 1950 में पत्थरों पर लिखा गया इतिहास धरती मां के गर्भ से बाहर मूर्तियों के रूप में बाहर आना शुरू हुआ। एक नकारात्मक बद नाम (बदनावर) उसका वास्तविक नाम वर्द्धमानपुर प्रकाश में आया। यहां से प्राप्त मूर्ति लेखों और प्रचलन में आना शुरू हुआ। जैसे-जैसे वर्द्धमानपुर नाम का प्रयोग बढ़ा। वैसे-वैसे यह नगर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता गया और इसका वैभव वृद्धिगत होने लगा। आज जब हम उस ऐतिहासिक पल का अमृत काल (1950-2025) मना रहे हैं तब यह ऐतिहासिक नगर वर्द्धमानपुर अपनी वैश्विक पहचान बनाने की ओर अग्रसर इस पीएम मित्र पार्क के जरिए होने जा रहा है। विश्व के लिए भले ही नाम का कोई महत्व नहीं होता हो परन्तु, भारत और भारतीय संस्कृति में नामों से ही संस्कृति की परिभाषा लिखीं जाती रही है। यह सिर्फ काल्पनिक तथ्य नहीं है। यह आधारभूत सत्य है।

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