आचार्य श्री सुंदर सागरजी महाराज का प्रातः बेला में रामगंजमंडी नगर में मंगल प्रवेश हुआ। उन्होंने नालोदिया से मंगल विहार करते हुए अंबेडकर सर्किल से नगर की सीमा में प्रवेश किया। महाराज श्री को अंबेडकर सर्किल स्टेशन चौराहा होते हुए शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर लाया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री सन्मति सागरजी महाराज के शिष्य आचार्य श्री सुंदर सागरजी महाराज का प्रातः बेला में रामगंजमंडी नगर में मंगल प्रवेश हुआ। उन्होंने नालोदिया से मंगल विहार करते हुए अंबेडकर सर्किल से नगर की सीमा में प्रवेश किया। महाराज श्री को अंबेडकर सर्किल स्टेशन चौराहा होते हुए शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर लाया गया। मंदिर जी के प्रवेश द्वार पर महाराज श्री का पाद प्रक्षालन, मंगल आरती कर अगवानी की गई। आचार्य श्री संघ ने मूल नायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। उसके बाद प्रातः 8:30 बजे मंदिर जी के सभा कक्ष में धर्मसभा हुई।
व्यक्ति को आत्मा का बोध हो तो वह परमात्मा बन जाए
धर्म सभा में आर्यिका सुलक्ष्यमति माताजी ने कहा कि अपने पुण्य को समझो और नगर में अगर संत आए तो उनकी सेवा में लग जाओ। गुरु की वाणी से ही अंतरंग में परिवर्तन होगा। समय की दुर्लभता को समझें। उन्होंने कहा कि लोक में जो कुछ भी नजर आता है, वह 6 द्रव्यों में ही नजर आता है। इस अवसर पर आचार्य श्री सुंदर सागरजी महाराज ने मोबाइल पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब से मोबाइल आया है संबंध समाप्त हो गए हैं। बोलचाल बंद हो गई है। आज का व्यक्ति मोबाइल का दीवाना हो गया है।परमात्मा को भी भूलने लगा है। उन्होंने जैन दर्शन के विषय में कहा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि भगवान महावीर के शासनकाल में जी रहे हैं और हमें जैन लिखने का अधिकार प्राप्त है। वीतराग शासन में यदि आत्मा का बोध हो गया, भेद विज्ञान को समझ लिया व्यक्ति को आत्मा का बोध हो जाए तो वह परमात्मा बन जाएगा।
जैन संत हैं तो जैन शासन सुरक्षित है
दूसरों की सुनोगे तो कुछ नहीं कर पाओगे। अपनी सुनोगे तो अपनी आत्मा को जान पाओगे। यदि आत्मा से कषाय नष्ट हो जाएगी तो यह आत्मा परमात्मा बन जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि जैन संत हैं तो जैन शासन सुरक्षित है। व्यक्ति यदि रागियों की संगति में रहेगा तो आत्मा की अनुभूति नहीं कर पाएगा। आचार्य श्री की मंगल आहारचर्या का सौभाग्य जितेंद्र कुमार सोमेंद्रकुमार परिवार को प्राप्त हुआ। संध्या बेला में महाराज श्री का मंगल विहार कोटा की ओर हुआ।













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