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दस धर्मों को आत्मसात करें जीवन को समुन्नत बनाएं : क्षुल्लकश्री महोदय सागरजी महाराज ने जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है की महिमा बताई


पर्वराज पर्यूषण के चौथे दिन श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम शौच दिवस भक्ति भाव से मनाया गया। इस अवसर पर क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है की महिमा बताई। धरियावद से पढ़िए, यह खबर…


धरियावद। पर्वराज पर्यूषण के चौथे दिन श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम शौच दिवस भक्ति भाव से मनाया गया। इस अवसर पर क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि आज इस पाश्चात्य संस्कृति ने भोग-उपभोग की वस्तुओं का अंबार लगा दिया और हर व्यक्ति को वह सब कुछ चाहिए जो उसके पास नहीं है। लोभ की तासीर यही है कि आदमी बूढ़ा हो रहा है, परंतु उसकी तृष्णा जवान होती जा रही है। तृष्णा का अर्थ है प्राप्त के प्रति असंतोष और अप्राप्त के प्रति आकांक्षा।

तृष्णा मोह को सदा जिंदा रखती है। क्षुल्लक जी ने कहा कि पैसे और पद का गुरूर नहीं करना चाहिए। जब वक्त की लाठी पड़ती है तो बड़े-बड़ो का अंत ठिकाने आ जाता है। आदमी सबसे ऊंची चोटी पर जा सकता है, लेकिन वहां अधिक देर नहीं रह सकता है। इसलिए जो प्राप्त है वही पर्याप्त है। इन दो शब्दों में सुख बेहिसाब है।

क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने कहा कि जैसे करोड़ों शवों को भस्मीभूत करके श्मशान कभी तृप्त नहीं होता, निरंतर भोजन करने से पेट कभी तृप्त नहीं होता, वैसे ही तृष्णा की भूख से मानव का मस्तिष्क कभी तृप्त नहीं होता। पर्वराज पर्यूषण की आराधना का अवसर हमारे बीच है। हम इन दस धर्मों को आत्मसात कर अपने जीवन को समुन्नत बना सकते हैं। उत्तम शौच धर्म हमारी आत्मा को पवित्र करने वाला है।

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