अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। अब तक इस आयोजन में कुल 2464 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन भी हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है।
विधान के 11वें दिन, मुख्य पुण्यार्जक विमला, रत्नेश, ममता, सिद्धांत, दीपाली, रोहित, सोनाक्षी (जैन, मुंबई), श्रीकांत पैलेस इंदौर परिवार और अंजलि के जन्मदिन के उपलक्ष्य में अजीत, रंजू, अंकिता, अंजलि, हिमांशी (जैन परिवार, गुवाहाटी) ने दोनो दिन मिलाकर भक्तामर काव्य के 41, 42, 43 और 44 काव्य की आराधना करते हुए कुल 224 अर्घ्य समर्पित किए।
अब तक इस आयोजन में कुल 2464 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस विशेष अवसर पर शान्तिधारा का लाभ रत्नेश-ममता जैन परिवार को प्राप्त हुआ। दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का लाभ भी रत्नेश-ममता जैन परिवार को मिला। इसके साथ ही, शास्त्र भेंट का लाभ विजय जैन, अशोक पालविया, रत्नेश जैन परिवार को प्राप्त हुआ।
बचपन से डालें संस्कार
इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “जैसा व्यक्ति का नेचर होगा, वैसा ही उसका फ्यूचर होगा।” उन्होंने बताया कि व्यक्ति की पहचान उसके धर्म, रूप, या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती है।
उनके अनुसार, जो लोग अपने व्यवहार को बदलते हैं, वे परमात्मा के समकक्ष पहुंच जाते हैं। मुनि ने यह भी कहा कि जिनका नेचर ठीक रहता है, उन्हें भविष्य की चिंता नहीं होती। वर्तमान में मानव का व्यवहार इस प्रकार बदल गया है कि लोग अपने व्यवहार को बदलने के बजाय दूसरों के व्यवहार को बदलना चाहते हैं।
जब किसी व्यक्ति को शमशान ले जाया जाता है, तो लोग उसके व्यवहार की चर्चा करते हैं, न कि उसके रूप, रंग या धन की। संस्कार और व्यवहार पर बोलते हुए, मुनि पूज्य सागर ने कहा कि माता-पिता बचपन में बच्चों के व्यवहार पर ध्यान नहीं देते, और बाद में उनके भविष्य की चिंता करने लगते हैं। अगर वे बचपन से ही करुणा, दया, और प्रेम के संस्कार बच्चों में पोषित करते हैं, तो उस बच्चे का भविष्य इतिहास के पन्नों में अमर हो सकता है।
महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए, मुनि श्री ने कहा कि आज हम गांधीजी को उनकी सरलता, सहजता, और सकारात्मक सोच के लिए याद करते हैं। यदि हम भी दूसरों के दिलों में स्थान बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। उन्होंने कहा कि आज मानव का व्यवहार इस कदर बिगड़ गया है कि लोग उसे जानवरों के नाम से भी पुकारने लगे हैं, जबकि जानवरों और देवताओं को किसी अन्य नाम से नहीं पुकारा जाता। परिवार की सुख-शांति पर बोलते हुए, अंतर्मुखी महाराज ने कहा कि सास-बहू, पिता-पुत्र, और भाई-भाई के बीच झगड़े और मनमुटाव का मुख्य कारण हमारा व्यवहार है। हम अचानक एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं और एक-दूसरे की निंदा करने लगते हैं, जिससे घर में कलह शुरू होती है। उन्होंने जीवन में शांति, सुख, और समृद्धि के लिए तीन प्रकार के व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता बताई:
1. “किसी में कमी नहीं देखूंगा।”
2. “किसी का मजाक नहीं बनाऊंगा।”
3. “अपनी बातों से आग नहीं लगाऊंगा।”
यदि हम इन तीन बदलावों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो समझ लीजिए कि हम इंसान बन गए हैं।













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