बड़वानी में दशलक्षण पर्व पर आर्यिका मां विकुंदन श्री जी ने त्याग और दान के महत्व पर प्रवचन दिया। उन्होंने बताया कि जीवन में त्याग और दान ही आत्मशुद्धि का मार्ग है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
बडवानी में विराजित आर्यिका मां विकुंदन श्री जी ने पर्वराज पर्यूषण के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म पर प्रेरक प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि जैसे वृक्ष पुराने पत्ते गिराकर नए पत्ते और फल प्राप्त करता है, वैसे ही त्याग से नया जीवन मिलता है। माताजी ने समझाया कि संग्रह अंततः हानि और शून्यता की ओर ले जाता है, जबकि त्याग आत्मिक उत्थान का मार्ग है। साधु-संत त्याग के माध्यम से समाज को ज्ञान और उपकार प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि दान चार प्रकार का होता है – आहार दान, औषध दान, ज्ञान दान और अभय दान। इनका अभ्यास जीवन को सफल और पुण्यवान बनाता है।
अभय दान से करुणा एवं मोक्ष का मार्ग खुलता
माताजी ने कहा कि आहार दान से अन्नपूर्णा की कृपा रहती है, औषध दान से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, ज्ञान दान से विद्वता मिलती है और अभय दान से करुणा एवं मोक्ष का मार्ग खुलता है। साधु-संतों की सेवा और जीवों की रक्षा करना भी त्याग धर्म की पराकाष्ठा है। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों को आहार देने वाला व्यक्ति तद्भव मोक्षगामी होता है। राजा वज्रजंघ के आहार दान का उदाहरण देते हुए बताया कि उसके प्रभाव से सभी जीवों को उत्कृष्ट पर्याय मिली। माताजी ने अंत में कहा – “यह शरीर भी किराए का मकान है, एक दिन इसे छोड़ना ही है। इसलिए त्याग और दान से अपने जीवन को सफल और सुरक्षित बनाओ।”













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