बड़वानी जैन मंदिर में श्रमणि आर्यिका विकुंदन श्री द्वारा पिच्छी परिवर्तन किया गया और धर्म सभा में साधना, श्रद्धा और जीवन संयम पर प्रेरक संदेश दिए गए। पढ़िए दीपक प्रधान की रिपोर्ट…
बड़वानी जैन मंदिर में आज आर्यिका विकुंदन श्री माताजी के ससंघ की उपस्थित में धर्मसभा आयोजित हुई, जिसमें माताजी ने कहा कि साधु बहते हुए पानी के समान होते हैं, जो एक स्थान पर नहीं रुकते। उन्होंने श्रावकों को समझाया कि धर्म घड़े जैसा है जिसे समय-समय पर जुगाली करना आवश्यक है, नहीं तो उसमें काई जम जाती है। चातुर्मास में अर्जित धर्म को जीवन में उतारने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि पुरानी गलतियों को त्यागे बिना नई सीख ग्रहण नहीं की जा सकती।
माताजी ने श्रावक की पहचान श्रद्धावान, विवेकवान और देव-शास्त्र-गुरु में दृढ़ विश्वास रखने वाला बताया। सभा में जीवन को उत्कृष्ट बनाने हेतु साधु-संघ के आहार, विहार और संभाल की महत्ता बताई गई। प्रवचन के अंत में आर्यिका विकुंदन श्री ने वर्ष में होने वाले परंपरागत पिच्छी परिवर्तन किया और नई पिच्छी श्रावकों से ग्रहण की। चातुर्मास के दौरान उन्होंने समाज को जिनसरस्वती स्तोत्र, बारह अनुप्रेक्षा, तत्वार्थसूत्र, मेरी भावना जैसे अनेक आध्यात्मिक सूत्रों से परिचित कराया जिनका श्रवण कर श्रावकों को अपनी दिनचर्या को शुभ उपयोग में लगाने का मार्गदर्शन मिला।













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