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कर्म का फल तो सब को भोगना ही पड़ता है, जैसा जो करेगा वैसा फल उसे मिलेगा : आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने राग द्वेष के बारे में बताया 


राग दो प्रकार का होता है, प्रशस्त राग और अप्रशस्त राग। देव शास्त्र गुरु के प्रति जो राग है। हमारा ये संसार में भ्रमण कराने वाला नहीं है ये संसार से तिराने वाला है। भगवान के दर्शन करेंगे, शास्त्र पढ़ेगे, गुरु के पास जाएंगे इनका ये जो राग है सुबह की लालिमा के समान है। दो समय लालिमा होती है सुबह की लालिमा जगाने वाली होती है और शाम की सुलाने वाली, प्रमाद बढ़ाने वाली होती है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


इंदौर। तुम्हारे साथ किसी ने बुरा किया, धन संपत्ति हड़प ली तो ये मत सोचो कि एक न एक दिन मैं भी इसकी धन संपत्ति को हड़पूंगा. अगर उसने आज 5 रु.की चोरी की है तो आगे उसको 500 रुपए का नुकसान होगा। क्योंकि कर्म का बंध चल रहा है, वह चोरी में खुश होकर परिग्रहानंदी रोद्र ध्यान कर रहा है। तुम उसके यहां चोरी करवा कर, उसको नुकसान पहुंचाकर पाप का बंध मत करो। न खोटे भाव करो न क्रोध करो बल्कि क्षमा भाव रखो। उसके कर्म का फल तो उसे मिलना ही है जो जैसा करेगा उसका फल भी उसे मिलेगा।

तुम लोग नेत्रे नहीं जानते, नेत्रे मतलब…पहले छाछ बिलौने के लिए एक घड़ा होता था। उसमें एक मथानी होती थी जिसमें एक रस्सी (नेत्रे)बंधी होती है उसके दोनों छोर से मथने वाला एक रस्सी खींचता है। एक छोड़ता है…तब वह मथानी घूमती है और मक्खन बनता है। इसी प्रकार यहां इस संसार रूपी घड़े में जीव रूपी मथानी क्यों घूम रही है? राग द्वेष रूपी नेत्रों के कारण जब तक यह जीव राग द्वेष करता रहेगा इस संसार में घूमता ही रहेगा। अगर इस नेत्रे की रस्सी टूट जाए मतलब राग द्वेष खत्म हो जाए तो इस जीव का संसार भ्रमण समाप्त हो सकता है। यह कहना है उदय नगर में ससंघ (7 पिच्छि )चातुर्मास कर रहीं विदुषी आर्यिका विज्ञान मति माताजी का।

विशेष प्रवचन माला में माताजी ने राग द्वेष की चर्चा करते हुए कहा कि राग दो प्रकार का होता है, प्रशस्त राग और अप्रशस्त राग। देव शास्त्र गुरु के प्रति जो राग है। हमारा ये संसार में भ्रमण कराने वाला नहीं है ये संसार से तिराने वाला है। भगवान के दर्शन करेंगे, शास्त्र पढ़ेगे, गुरु के पास जाएंगे इनका ये जो राग है सुबह की लालिमा के समान है। दो समय लालिमा होती है सुबह की लालिमा जगाने वाली होती है और शाम की सुलाने वाली, प्रमाद बढ़ाने वाली होती है। इसी प्रकार अप्रशस्त राग भोगों का राग है। पत्नी बच्चों का राग है। पंचेद्रिय के विषयों के प्रति राग है…ये राग हमें संसार सागर में डुबोने वाला है। लोक में राग ज्यादा दिखता है और अच्छा माना जाता है। द्वेष अच्छा नहीं माना जाता और जो अप्रशस्त राग है वह कभी भी अच्छा नहीं होता। भगवान को वीतरागी कही गया है। वीतद्वेषी नहीं क्योंकि जिसका राग नष्ट हो गया वह द्वेष मुक्त हो गया। इसलिए ही भगवान को वीतरागी कहां जाता है।

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