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कर्म का प्रतिफल हमें ही भोगना पड़ता है: आर्यिका विभाश्री ने प्रवचन में कर्म के बारे में बताया 


यदि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, किसी का बुरा सोचते हैं तो हमें पाप का बंध अवश्य होगा। धर्म वर्जिता स्वयं धर्म नहीं करता, जो अपने अधीन है उसको भी धर्म नहीं करने देता तथा जो अपने अधीन नहीं है उसकी मन वचन काय से निन्दा करता है। पढ़िए एक रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा यदि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, किसी का बुरा सोचते हैं तो हमें पाप का बंध अवश्य होगा। धर्म वर्जिता स्वयं धर्म नहीं करता, जो अपने अधीन है उसको भी धर्म नहीं करने देता तथा जो अपने अधीन नहीं है उसकी मन वचन काय से निन्दा करता है। वह कृष्ण लेश्या के परिणाम वाला जीव होता है। जीवन में धर्म ध्यान युवावास्था में ही संभव है। बुढ़ापे में तो लोग शरीर और रोगो से ग्रसित होते है और जीवन में इतना पाप संचित कर लेते है कि उनसे धर्म होता ही नहीं। जब राजकुमार बचपन से युद्ध भूमि में तलवार चलाने का अभ्यास करता है तभी वह युवावस्था में युद्धभूमि में विजय की यश पताका को लेकर आता है। रागी और भोगी जीवों की दशा बुढ़ापे में ऐसी होती है कि उन्हें णमोकार एवम् ,धर्म आदि नहीं सुहाता है उन्हें तो अपने परिवार की चिन्ता सताती है।

हम बिना कर्म किए रह नहीं सकते। हर कर्म का प्रतिफल भी हमें ही भोगना होता है। मनुष्य जीवन में तो व्यक्ति का मोहनीय कर्म इतना प्रबल है कि वह अनेक तर्क देकर अपनी बात सिद्ध करना चाहता है, गुरुदेव हमें हमेशा उपदेश देते हैं कि आप धर्म के मार्ग पर लग जाएं। भारत वर्ष में संपूर्ण आर्यावर्त में सबसे बड़ा पुण्यशाली कौन है। इस संसार में सबसे बड़ा पुण्यात्मा वह है जो संसार के भोगों को त्याग कर मुनि बना है। ‘ मुनि सकलव्रती बड़भागी , भव भोगन तें वैरागी। यदि चक्रवर्ती अपने छः खण्ड और राज्य वैभव को त्याग कर मुनि नहीं बनता, दीक्षा नहीं लेता वह मर कर के नियम से सप्तम नरक में जाता है। छोटे – छोटे बच्चे जब भगवान का अभिषेक करते हैं यही पंचमकाल का चमत्कार है कि छोटे बच्चे वीतराग देव का दर्शन करते हैं।

हम अच्छा-कर्म कर रहे हैं तो अपने आपको सौभाग्यशाली मानना कि मैं सद्गति प्राप्त कर सकता हूं, चाहे कोई मेरा सम्मान करे या न करे मैं अपने कर्मों से सम्मानित हूं। जो बोया है वही काटने को मिलता है। इसी तरह हमें अच्छे आचरण पर आध्यात्मिक जीवन में गुरुकृपा या परमात्मा की अनुकंपा प्राप्त होती रहती है। मनुष्य भाग्य को कर्म के माध्यम से बदल भी सकता है। जप, तप आदि वे कर्म हैं जिनके माध्यम से भाग्य भी बदल जाता है।

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