व्यक्ति को जीवन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता, वह कभी भी गुणों को ग्रहण नहीं करता। दूसरों का सुख वह देख नहीं सकता है और दूसरों की खुशी को जो सहन नहीं कर सकता, वह व्यक्ति कभी अपने जीवन में खुश नहीं रह सकता। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…
रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति को जीवन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता, वह कभी भी गुणों को ग्रहण नहीं करता। दूसरों का सुख वह देख नहीं सकता है और दूसरों की खुशी को जो सहन नहीं कर सकता, वह व्यक्ति कभी अपने जीवन में खुश नहीं रह सकता।
दूसरों का बुरा सोचने से किसी का बुरा नहीं होता, यह उसके अच्छे-बुरे परिणामों पर निर्भर करता है। अत: व्यर्थ में दूसरों के विषय में बुरा नहीं सोचना चाहिये। ईर्ष्या करने वाला मनुष्य भीतर से कमजोर होता है। वह दीन होता है, असहाय होता है। वह दुख सहने के योग्य नहीं होता है। इसलिए उसमें ईर्ष्या के भाव जागते हैं। ऐसा व्यक्ति हमेशा असंतोष और दुख में जीता है। संसार की वैभवशाली वस्तुएं उसे दुखी करती हैं। उसे देखने का उसका दृष्टिकोण ही अलग होता है।
अगर मन में किसी के लिए ईर्ष्या के भाव ही न हों तो जीवन का नजरिया ही बदल जाएगा। राग और द्वेष हर व्यक्ति के अंदर होता है। संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं । कुछ व्यक्ति तो ईश्वर पर आस्था रखते हैं। कुछ व्यक्ति ईर्ष्या पर आस्था रखते हैं। ईश्वर पर आस्था रखने वाले जीवन में महान बन जाते हैं। ईर्ष्या पर आस्था रखने वाले दुखी होते हैं अत:ईर्ष्या को छोड़कर ईश्वर पर आस्था रखना चाहिए। कितना भी बड़ा महल ,अट्टालिका क्यों न हो, कितनी छोटी गरीब की झोपड़ी क्यों न हो उसमें एक न एक दरवाजा अवश्य होता है।
इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के अंदर गुण अवगुण अवश्य होते हैं। गुणों को ग्रहण करने वाला व्यक्ति सद्गृहस्थ कहलाता है। व्यक्ति को जैसी संगति मिलती है। वैसी ही परिणति उसकी हो जाती है। सज्जन व्यक्ति दुर्जन व्यक्ति के जीवन में भी गुण खोज लेता और दुर्जन व्यक्ति सज्जन पुरुषों में दोषों को खोजने का प्रयास करता है। ईर्ष्या व्यक्ति और व्यक्ति के बीच असमानता और अलगाव के कारण उत्पन्न होती है। किसी की भी संपन्नता किसी को नहीं भाती और वही उसके ईर्ष्या का कारण बन जाता है।













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