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आर्यिका विभाश्री माताजी ने वाणी संयम के बारे में बताया : अपनी वाणी से हित-मित-प्रिय वचन बोलना चाहिए

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गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि अपने शौक के लिये किसी को शोक में नहीं डालना चाहिए। हम अपने शौक के लिए जीव जन्तुओं की हिंसा करते हैं । हम लिपस्टिक, शैम्पू लगाते हैं, चमड़े के बेल्ट लगाते हैं ये सब हिंसक चीजे हैं । खरगोश के बच्चों को मारकर उसकी चर्बी से शैम्पू तैयार किया जाता है । रेशम के हजारों कीड़ों को मारने पर एक धागा तैयार होता है फिर एक साड़ी को तैयार करने में सोचो कितने कीड़ों की हिंसा की जाती है। पढ़िए एक रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि अपने शौक के लिये किसी को शोक में नहीं डालना चाहिए। हम अपने शौक के लिए जीव जन्तुओं की हिंसा करते हैं । हम लिपस्टिक, शैम्पू लगाते हैं, चमड़े के बेल्ट लगाते हैं ये सब हिंसक चीजें हैं। खरगोश के बच्चों को मारकर उसकी चर्बी से शैम्पू तैयार किया जाता है। रेशम के हजारों कीड़ो को मारने पर एक धागा तैयार होता है फिर एक साड़ी को तैयार करने में सोचो कितने कीड़ों की हिंसा की जाती है।

स्वयं की चाहत के लिए चाहे सौंदर्य प्रसाधन हों या चमड़े की वस्तुएं, जिनमें हिंसा समाई हो, ऐसी चीजों का प्रयोग भी नहीं करना ,यह जैन धर्म के विरुद्ध है ।हमारा मन प्रतिदिन नई-नई चीजों को प्राप्त करना चाहता है, यदि हमारे पास साइकिल है तो हम चाहते हैं कि हमें मोटर साइकिल मिल जाए, मोटर साइकिल मिल जाती है तो हम चाहते है कि कार मिल जाये ऐसे ही जीवन में इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो पाती है। जीवन में पानी का और वाणी का बहुत बड़ा महत्व है, ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय ।।

विधाता की ओर से मनुष्य को प्रदत्त सबसे अनमोल उपहार है, उसकी वाणी। वाणी के द्वारा हम न केवल अपने मन की अतल गहराइयों के भाव व्यक्त करते हैं, अपितु अपने परिवेश को वाणी द्वारा ही सम्बोधित करते हैं। इसी कारण, संतों ने ऐसी वाणी बोलने का परामर्श दिया है जो औरों को शीतल करे और स्वयं को भी ठंडक पहुंचाएं। सचमुच संसाररूपी इस कटुवृक्ष के दो अमृत तुल्य फल हैं- सरस प्रियवचन और विनम्रता, हमारे शरीर में आंखें दो है परन्तु काम एक करती है देखने का, हमारे कान दो है और काम एक करते हैं सुनने का, हमारे दो पैर काम एक करते हैं चलने का, लेकिन हमारे शरीर में जीभ एक है लेकिन काम दो करती है एक चखने का दूसरा ( बकने ) बोलने का ।

हमें अपनी वाणी से हित-मित-प्रिय वचन बोलना चाहिए। ऐसी बैठक बैठिए, कोई न कहे उठ। ऐसी वाणी बोलिए, कोई न कहे चुप। हमें 60 साल की जो मनुष्य पर्याय मिली है वह मोह में गवाने के लिए नहीं मिली है, शौक शान करने के लिये नहीं मिली है, बल्कि हमें यह पर्याय चौरासी लाख योनियों के बाद मिली है इसे पुरुषार्थ के साथ आत्मसात करना चाहिए।

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