टोंक अतिशय क्षेत्र में आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में आर्यिका श्री वत्सलमती एवं आर्यिका श्री प्रेक्षा मति माताजी ने अहिंसा एवं अपरिग्रह की भावना से केशलोचन की कठोर तप साधना संपन्न की। भक्तिजन ने वैराग्यपूर्ण भजनों के साथ अनुमोदना की। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
टोंक अतिशय क्षेत्र में प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में आज आर्यिका श्री वत्सलमती माताजी एवं आर्यिका श्री प्रेक्षा मति माताजी ने जैन दिगंबर परंपरा की प्राचीन एवं अत्यंत कठोर तप साधना — केशलोचन का निर्वाह किया।
समय पर पूरा आर्यिका संघ एवं उपस्थित श्राविकाओं ने वैराग्य से ओतप्रोत भजन गाकर वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। आर्यिका श्री महायश मति जी ने बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु-साध्वी के लिए 2 से 4 माह के भीतर केशलोचन अनिवार्य होता है क्योंकि यह राग, मोह एवं देहाभिमान से मुक्त होने का प्रतीक है। इसमें केवल राख का प्रयोग करते हुए अपने ही हाथों से बाल उखाड़े जाते हैं, जिससे अहिंसा, त्याग तथा अपरिग्रह की पराकाष्ठा प्रकट होती है।
उन्होंने कहा कि बाल सौंदर्य और मोह के प्रतीक माने जाते हैं, अतः उनका त्याग आत्मकल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कदम है। केशलोचन के दिन साधु-साध्वी उपवास करते हैं तथा इस तपस्या की अनुमोदना से भी पुण्य की विशेष प्राप्ति होती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और महिलाओं ने भक्ति व वैराग्यमय गीतों के माध्यम से भावपूर्ण अनुमोदना की।













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