गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ का रविवार को शहर के जैन भवन में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। प्रातः 9 बजे समाज बंधुओं ने बस्सी चौराहे पर आर्यिका संघ की अगवानी की। वहां से गाजे बाजे के साथ सकल जैन समाजजन नाचते-गाते प्रमुख मार्गों से होते हुए आर्यिका संघ को जैन भवन लाए। टोडारायसिंह से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
टोडारायसिंह। गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ का रविवार को शहर के जैन भवन में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। प्रातः 9 बजे समाज बंधुओं ने बस्सी चौराहे पर आर्यिका संघ की अगवानी की। वहां से गाजे बाजे के साथ सकल जैन समाजजन नाचते-गाते प्रमुख मार्गों से होते हुए आर्यिका संघ को जैन भवन लाए। इस दौरान जगह जगह भक्तों ने गुरु मां की आरती कर पाद प्रक्षालन कर आर्शीवाद लिया। जैन भवन के प्रवेश द्वार पर गुरु मां का 51 विशेष थाल सजाकर पाद प्रक्षालन किया। इस दौरान मंदिर परिसर भगवान के जयकारों से गुंज उठा। जैन समाज अध्यक्ष संतकुमार जैन और प्रवक्ता मुकुल जैन ने बताया कि इस मौके पर धर्मसभा हुई। कार्यक्रम की शुरूआत चित्र अनावरण से की गई। चित्र अनावरण अग्रवाल चौरासी समाज के नवनियुक्त अध्यक्ष अनिल मित्तल और सभी जैन मंदिरों के अध्यक्ष ने किया। इंदु मित्तल ने मंगलाचरण किया। आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आजकल बेवकूफ बच्चे पैदा होना बंद हो गए हैं। नई प्रतिभावान पीढ़ी को सही दिशा दिखाना समाज का महत्वपूर्ण कर्तव्य है, नहीं तो इनकी प्रतिभा का उपयोग गलत हो जाएगा।
जैन श्रावक को पिच्छी और कमंडल का उपासक होना चाहिए
माताजी ने कहा कि समय के साथ सबकुछ बदल जाए लेकिन देव ,शास्त्र, गुरु की भक्ति मत बदलना। धर्म की अंगुली पकड़कर चलते रहेंगे तो जीवन धन्य हो जाएगा। यदि धर्म छूट गया तो जीवन में विपदाओं की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने टोडा में मंगल प्रवेश को वात्सल्य प्रवेश बताया। इस अवसर पर उन्होंने टोडा में स्वाध्याय शुरु करने के लिए महिला-पुरुषों की टीम का गठन किया। इस अवसर पर समाज अध्यक्ष संतकुमार जैन ने कहा कि टोडा के लोगों का सौभाग्य है कि आर्यिका माताजी का टोडा में आगमन हुआ है। एक जैन श्रावक को पिच्छी और कमंडल का उपासक होना चाहिए और हर जैन मुनि और आर्यिका संघ का प्रवेश-आहार-विहार पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ कराना चाहिए।
मुनि-आर्यिका और श्रावक-श्राविका धर्म के चार पहिए
आर्यिका श्री ने कहा कि जिस प्रकार एक रथ को चलाने के लिए चार पहियों की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार धर्मरूपी रथ को आगे बढ़ाने के लिए मुनि-आर्यिका और श्रावक-श्राविका रूपी चार पहियों की बहुत जरूरत है। अगर एक भी पहिया अपने दायित्व और कर्तव्य से पीछे हटा तो धर्म का पहिया वहीं रुक जाएगा। इस अवसर पर सकल जैन समाज के साथ पीपलू, केकड़ी, देवली,राजमहल, झिराना आदि जगह से सैकड़ों श्रावक उपस्थित रहे। संचालन पंडित संजीव कासलीवाल ने किया।













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