आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो मुनिराज अंतरंग से जिन लिंग धारी हैं। पांच समितियां और पांच महाव्रत का पालन करते हैं वह सभी हमारे लिए पूजनीय हैं। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…
इंदौर। आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो मुनिराज अंतरंग से जिन लिंग धारी हैं। पांच समितियां और पांच महाव्रत का पालन करते हैं वह सभी हमारे लिए पूजनीय हैं। साधु परमेष्टि के गुणस्थान को जानना, केवली भगवान के ज्ञान का विषय है। अतः जो हमारे ज्ञान का विषय नहीं है, हमें उन विषयों की अपेक्षा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जो जिन लिंग धारी मुनिराज हैं, वे हम सभी के लिए पूजनीय हैं।
भावों से नरक और मोक्ष का रास्ता
भगवान महावीर स्वामी का विपुलआंचल पर्वत पर समवशरण आया हुआ था। राजा श्रेणिक समवशरण में जा रहे थे और रास्ते में उन्होंने एक दिगंबर साधु को तपस्या करते हुए देखा और उन्हें सोचा कि यह साधु कितने तपस्वी हैं यह निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त करेंगे। किंतु वहीं पर कुछ राहगीर जो कि समवशरण की ओर जा रहे थे, वे उन मुनिराज के ऊपर कटाक्ष करते हुए जा रहे थे कि देखिए यह राजा थे। उन्होंने अपने राज्य को छोड़ा अपने छोटे से बेटे को छोड़ा। अपनी पत्नी को छोड़ा और दूसरा शत्रु राज्य उनके ऊपर आक्रमण कर रहा है। मुनि की तपस्या भंग हो गई उनके अंदर क्रोध जागृत हुआ। जब राजा श्रेणिक भगवान महावीर स्वामी के सामने पहुंचे और उन्होंने महावीर स्वामी की समवशरण सभा में प्रश्न किया कि हे भगवान हमें बताइए कि जो मुनिराज तपस्या कर रहे हैं उनका कल्याण किस प्रकार होगा। तब भगवान की वाणी खिरी और उस वाणी में आया कि उन्हें सातवां नर्क प्राप्त होगा। किंतु कुछ ही क्षण बाद नगाड़े बजने लगे। ढोल बजने लगे और भगवान की वाणी में आया कि उन्हें मोक्ष हो गया है। दरअसल हुआ यह कि वे मुनिराज सोचने लगे कि वह पुनः राजा बन गए हैं और खयालों में वे युद्ध स्थल पर पहुंच गए शत्रु राजा से युद्ध कर रहे हैं और उन्होंने सोचा कि मैं, अपने मुकुट से इस राजा की हत्या कर दूंगा। तब उसी क्षण उनका हाथ सर पर गया और केस लोंच किए सर पर हाथ लगने से तुरंत उन्हें यह ध्यान आया कि नहीं मैं तो साधु हूं और मेरा संसार विषयों में कोई प्रयोजन नहीं और वे शुक्ल ध्यान में लीन हो गए उन्होंने आलोचना पाठ किया और अंतरमूर्त में मोक्ष हो गया इसलिए कहते हैं कि भावनाएं भव नाशनी होती हैं। देखिए कहां कुछ क्षण पहले उनका भविष्य सातवें नर्क में दिखाई दे रहा था और कहां कुछ क्षणों में ही उन्हें मोक्ष हो गया।
अनंतानुबंधी माया चारी कषाय का बंध
देव शास्त्र गुरु के साथ धोखा करने से अनंता अनुबंधित माया चारी कषाय का बंध होता है। जैसे आपने देव शास्त्र गुरु के सामने नियम लिया कि आप रात्रि को रोटी नहीं खाएंगे ,किंतु आपने रात्रि को पराठा खाना प्रारंभ कर दिया और कहा कि मैंने तो रोटी का नियम लिया था ।तो यह माया चारी है आप विचार करिए कि अगर किसी बच्चे को बोला जाएगी की छत पर खींचले सूख रहे हैं, अगर कौवे आते हैं तो उनको भगाना है। तो वह छोटा सा बालक भी मात्र कौवे का फर्क नहीं करता, अगर गिलहरी आ रही है कबूतर इत्यादि आ रहे हैं तो वो उन्हें भी भगाता है। तो फिर आप इस प्रकार से देव शास्त्र गुरु के सामने कैसे छल कर सकते हैं चिंतन करिए।
चारित्र मोहनीय कर्म का बंध
धर्म की हंसी उड़ाने से चारित्र मोहिनी कर्म का बंध होता है। साधुओं की बात प्रमाणिक होती है। आप अगर धर्म कर सकते हैं तो करें किंतु साधुओं का, धार्मिक क्रिया करने वाले लोगो का, धर्म प्रभावना करने वाले लोगों का मजाक नहीं बनाना चाहिए अन्यथा आपको चरित्र मोहनी कर्म का बंध हो सकता है। आप धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें।
मनुष्यपर्याय बहुत मुश्किल से प्राप्त हुई है
मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है। स्व और पर के आत्म उत्थान के विषय में सोचना और व्यवहार में लाना मनुष्य जन्म की पूर्णता और सफलता का परिचायक है।
पंचेंद्रीय के विषय दस्यु लुटेरे
मदिरा को पीने के बाद व्यक्ति अपने हितों को भूल जाता है। जिस प्रकार दस्यु(डाकुओं का दल ) घर में घुसकर हर वस्तु को लूटते है ऐसे ही पंचेंद्रिय के विषय हमारी आत्मा के हित करने वाले गुणों को लूटते है।













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