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आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने नारी पर्याय को किया सार्थक: अवतरण दिवस पर मुनिश्री जयंत सागर जी ने माताजी का किया गुणानुवाद


आचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर जी महाराज का चातुर्मास भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चल रहा है। इस दौरान यहां पर नित्य पूजा, आराधना और भक्ति के साथ ही मुनिराजों के प्रवचनों का दौर भी जारी है। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


नांद्रे। आचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर जी महाराज का चातुर्मास भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चल रहा है। इस दौरान यहां पर नित्य पूजा, आराधना और भक्ति के साथ ही मुनिराजों के प्रवचनों का दौर भी जारी है। प्रवचनों के माध्यम से दिगंबर जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को धर्म, ज्ञान और संस्कृति से परिचय करवाया जा रहा है। इस सिलसिले में मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज प्रवचन में कहा कि मनुष्य जन्म बड़ी दुर्लभता से प्राप्त होता है और बहुत पुण्य करने के बाद ही मिलता है। जो ये मनुष्य पर्याय में आकर भी उस मनुष्य जन्म को सार्थक नहीं करता, वह उस अंधे व्यक्ति के समान है, जिसे रत्नों का पिटारा सामने पड़ा दिखाई नहीं देता और आगे निकल जाता है, परंतु मनुष्य पर्याय को सार्थक कर सफलता के शिखर तक पहुंचने का किसी ने काम किया है तो वह हैं गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी।

व्यक्ति पुरुष बनने के बाद कार्य करने में सोचता है, निर्णय करने में सोचता है, लेकिन ज्ञानमती माताजी ने एक नारी पर्याय में छोटी सी उम्र में जब लड़‌कियां अपने जीवन में क्या करना क्या नहीं करना उसका निर्णय नहीं कर पाती थीं। लड़‌कियां सजती संवरती थीं परंतु ज्ञानमति माताजी ने छोटी सी उम्र में दिगंबर परंपरा में जिन दीक्षा को धारण कर लिया और दीक्षा के बाद अध्ययन आदि करके ऐसे अनेकों ग्रंथों पर जो महान-महान ग्रंथ है। उन पर टीका की और उन पर कार्य किया और तो और अनेकों प्राचीन तीर्थ क्षेत्र का निर्माण एवं नवीन निर्माण कराके हमारे संस्कृति को आगे बढ़ाया है। आज 92 वें वर्ष वर्धन दिवस पर भी अपनी तप-साधना में निरंतर तल्लीन हैं। हमारी यही भावना है कि माताजी ने ये संयम को जिस शिखर तक पहुंचाने के लिए दीक्षा ली। उस शिखर तक निरंतर ऐसे ही तप-साधना में लीन रहते हुए कलश विराजमान करें।

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