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आप अपने पुण्य वैभव को बीज बना रहे हैं या राख : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने पुण्य कर्म की समग्र व्याख्या की  


संसारी जीवों के पास दो प्रकार का वैभव पाया जाता है। पहला बाहरी धन-वैभव और दूसरा आत्मा का अंतरंग गुण धन। बाहरी धन वैभव पुष्य कर्म के अधीन है जो सदैव घटता-बढ़ता रहता है और एक दिन नष्ट भी हो जाता है किन्तु, जो आत्मा का अनंत गुण वैभव है।वह कभी नष्ट नहीं होता। यह उपदेश आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने धर्मसभा में दिए। मुजफ्फरनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


मुजफ्फरनगर उप्र। संसारी जीवों के पास दो प्रकार का वैभव पाया जाता है। पहला बाहरी धन-वैभव और दूसरा आत्मा का अंतरंग गुण धन। बाहरी धन वैभव पुष्य कर्म के अधीन है जो सदैव घटता-बढ़ता रहता है और एक दिन नष्ट भी हो जाता है किन्तु, जो आत्मा का अनंत गुण वैभव है।वह कभी नष्ट नहीं होता। यह बात सत्य है कि वर्तमान में आत्मा का अनंत गुण वैभव प्रगट नहीं हुआ है किंतु, जब भी पुरुषार्थ द्वारा वह अनंत गुण वैभव प्रगट होगा फिर वह वैभव कभी भी नष्ट नहीं होगा। ऐसा शुभ-मांगलिक धर्म उपदेश मुजफ्फरनगर के कल्पतीर्थ मंडप में 24 समवशरणों के मध्य 35 पिच्छीधारी संयमियों के साथ विराजमान आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने दिया। आचार्य श्री ने पुण्य का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि आज आपको पूर्व पुण्योदय से धन-वैभव प्राप्त हुआ है। आप उसे बीज भी बना सकते हो और राख भी बना सकते हो। ध्यान में लो, आपका धन-वैभव जब धर्म कार्यों के लिए समर्पित होता है तब वहीं धन वैभव आगामी सुख-अनुकूलनाओं के लिए बीज बनकर अनंतगुणा वैभव देने वाला है और जब आपका वहीं धन-वैभव सांसारिक भोग विलासों में लगता है तब वहीं वैभव जलकर राख बनकर नष्ट हो जाता है। आज मैं यही आपसे कहूंगा कि आप अपने पुण्य वैभव को बीज बनाए उसे राख बनाकर नष्ट न करें।

जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे

कल्पद्रुम महामंडल विधान में 24 समवशरणों की भव्यातिभव्य स्चना के मध्य विराजमान धर्मसभा के मध्य आचार्यश्री ने कहा कि आतम वैश्ववान अहा आतम है गुणवान अहा। आत्म धर्म की श्रद्धा से हो आतम भगवान अहा। शुद्धात्म शक्ति, हो-हो-२, भगवान बनाए रे। जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। आचार्य श्री ने कहा कि बंधुओं आपको बाहरी पुण्य का वैभव दिखाया। आज आप दाता है, बाहय वैभव में गाफिल हुआ मानव अपने आत्म गुण वैभव का तिरस्कार करता रहता है। श्री कल्पद्रुम महामंडल विधान की आराधना में अपना पुण्य समर्पित करके आत्म वैभव की भावना कर रहे हैं। यह पुरुषार्थ आपको आत्म सुख वैभव और बाहय पुण्य वैभव दोनों को दिलाने वाला होगा।

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