आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की अगवानी आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी परंपरा की गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने संघ सहित जहाजपुर आगमन के पूर्व की। आपने आचार्य वंदना और आचार्य भक्ति परिक्रमा लगाकर की। जहाजपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की खबर…
जहाजपुर। आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की अगवानी आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी परंपरा की गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने संघ सहित जहाजपुर आगमन के पूर्व की। आपने आचार्य वंदना और आचार्य भक्ति परिक्रमा लगाकर की। आर्यिका माताजी श्री स्वस्ति भूषण माताजी अन्य साधुओं प्रियंका दीदी एवं किशोर जैन इंदौर ने जहाजपुर मंदिर आगमन पर आचार्य श्री के 9 प्रकार के रत्नों केशर से चरण प्रक्षालन किए। आचार्य श्री वर्धमानसागरजी ने प्रवचन में दर्शन, अभिषेक,पूजन, आहारदान, सांसों का महत्व, वास्तविक दान ,समवशरण की रचना, दर्शन का महत्व ,पंचकल्याणक का महत्व, स्वयं के चिंतन, ब्यावर में आचार्य शांतिसागर जी के चातुर्मास, साधु के साधु के प्रति विनम्रता और विनय भाव, चक्रवर्ती शब्द का महत्व, जहाज का वास्तविक अर्थ ,संस्कृति और धर्म की रक्षा में आचार्य शांतिसागर जी के योगदान, जीवन में सांस का सदुपयोग आदि पर विस्तृत उपदेश दिया। आचार्य श्री ने बताया कि तीर्थंकर चक्रवर्ती एक समय में एक होते हैं। चक्रवर्ती 6 खंड पर विजय प्राप्त करते हैं।
जीवन में जितनी सांसे बची है उन सांसों को धर्म में लगाएं
प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने चारित्र के 6 खंडों पर विजय प्राप्त की थी। इसीलिए उन्हें चक्रवर्ती की उपमा दी गई। उनके जीवनकाल में अन्य कोई मुनि आचार्य चक्रवर्ती नहीं हुए। श्री शांति सागर जी ने धर्म और संस्कृति की रक्षा की। साधु दूसरे साधु के प्रति विनम्रता और भक्ति प्रदर्शित करते हैं साधुओं में आचार्य श्री शांति सागर जी और सिद्ध क्षेत्रों में श्री सम्मेद शिखर जी के दर्शन सभी को अवश्य करना चाहिए। धर्मात्मा सर्व को प्रेरणा और उपदेश देते हैं। जीवन में जितनी सांसे बची है उन सांसों को धर्म में लगाना चाहिए। तीर्थ क्षेत्र संयम साधना के स्थल है खाने पीने आमोद प्रमोद के स्थल श्रावकों ने बना दिया।इससे धर्म नहीं होता आपके विचारों क्रियाओं से हमारे तीर्थ क्षेत्र सुरक्षित नहीं हैं जीवन में धर्म को अपना कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने स्वस्ति धाम जहाजपुर में आयोजित धर्म सभा में प्रगट की।
सभी 5 मिनट स्वयं के बारे में चिंतन करें
आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि न्याय और नीति से अर्जित द्रव्य को दान देना चाहिए दान धर्म कार्य में देना चाहिए। समवशरण मंदिर धर्म का प्रतीक है जिन बिंब दर्शन से सम्यक ज्ञान होता है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सूर्य मंत्र से प्रतिमाओं में देवत्व के गुण आरोपित किए जाते हैं। जिनालय जिन बिंब के दर्शन श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए सभी को 5 मिनट स्वयं के बारे में चिंतन करना चाहिए। भगवान की प्रतिमा संदेश देती है। आचार्य श्री ने बताया कि 40 वर्ष पूर्व हमने जहाजपुर गांव में भगवान श्री नेमिनाथ और श्री मुनिसुब्रत नाथ भगवान के दर्शन किए थे।
सच्ची श्रद्धा सम्यक दर्शन है
आचार्य श्री ने बताया कि ब्यावर राजस्थान में आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी ने एक साथ चातुर्मास किया था। इसके पूर्व गणिनी आर्यिकाश्री स्वस्ति भूषण माताजी ने सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र की विवेचना की। देव शास्त्र गुरु वितरागी और होते हैं, उनके प्रति दृढ़ श्रद्धा रखना चाहिए। तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय में विवेचना है कि सच्ची श्रद्धा सम्यक दर्शन है। माताजी ने बताया कि सिद्धि और प्रसिद्धि में अंतर है लौकिक ज्ञान से प्रसिद्धि मिलती है किंतु रत्नत्रय धर्म से सिद्धि प्राप्त होती है।
साधुओं ने किया विहार
माताजी ने आचार्य श्री के प्रशंसा कर बताया कि मंगलवार चतुर्दशी को आचार्य श्री सहित सात साधुओं के उपवास थे। उसके बावजूद संघ ने प्रतिकूल मौसम में विहार किया। 27 जून को 36 वां आचार्य पदारोहण जहाजपुर में मनाया जाएगा। अनेक नगरों से भक्त चातुर्मास का पुनः निवेदन करेंगे। आचार्य श्री 27 जून को वर्ष 2025 के चातुर्मास स्थल की घोषणा करेंगे।













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