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इंदौर संग्रहालय में पार्श्वनाथ की पुरातन प्रतिमाएं संग्रहित: चार अद्भुत प्रतिमाओं का विवरण है ज्ञानवर्द्धक 


राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय बहुत समृद्ध है। इस संग्रहालय में अन्य प्रतिमाओं के साथ-साथ जैन श्रमण संस्कृति से संबंधित अनेकों प्रतिमाएं संग्र्रहित हैं। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भी प्रतिमाएं हैं। इंदौर से पढ़िए, डॉ. महेंद्रकुमार जैन ‘मनुज’ और हरिहरसिंह चौहान की यह प्रस्तुति…


इंदौर। यहां का राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय बहुत समृद्ध है। इस संग्रहालय में अन्य प्रतिमाओं के साथ-साथ जैन श्रमण संस्कृति से संबंधित अनेकों प्रतिमाएं संग्र्रहित हैं। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भी प्रतिमाएं हैं। उनमें से चार प्रमुख पार्श्व-प्रतिमाओं का परिचय यहां प्रस्तुत है।

कायोत्सर्ग पार्श्वनाथ प्रतिमा प्रथम

इंदौर संग्रहालय में संग्रहित बलुआ पाषाण में तीर्थंकर पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा कई स्थानों में भग्न होते हुए भी अपनी उत्कृष्टता का प्रतिभाष कराती है। पादपीठ भग्न है और वह आधार में छुपा हुआ है। चरणों के निकट से दोनों ओर चंवरधारी देव हैं। नीचे से धरणेंद्र की सर्पकुंडली बनते हुए शिर पर सप्तफणी शिरमुकुट उत्कीर्णित हैं। सर्पकुंडली दोनों ओर से परिदृष्ट है। उदर और ग्रीवा में सुंदर त्रिवली, वक्ष पर उष्णीष उत्कीर्णित है। मुखमंडल भग्न है। त्रिछत्र भी यथा स्थान है। दाहिनी ओर पार्श्व प्रतिमा से कुछ छोटा एक चामरधारी देव है, जो संभवतः संयुक्त रही और भी बड़ी प्रतिमा का चमरी देव है। यह गज के ऊपर खड़ा दर्शाया गया है। वितान में इसके ऊपर के स्थान में एक लघु पद्मासन जिन प्रतिमा है, उसके पार्श्व में माल्यधारी और उसके भी पीछे झांझ बजाता हुआ नर्तक है। इस पार्श्व-प्रतिमा के बाएं ओर भी शिल्पन है, किंतु भग्न है, मात्र एक ऋषि जैसी आकृति अवशिष्ट है।

कायोत्सर्ग पार्श्वनाथ प्रतिमा द्वितीय 

बलुआ पाषाण की इस प्रतिमा को पार्श्व प्रतिमा खंड कहा जाए तो भी अनुपयुक्त नहीं होगा क्योंकि, इसके साथ भी और प्रतिमा रही होगी, जो खंडित और अनुपलब्ध है। इस प्रतिमा के हाथ भग्न हैं, मुखमंडल सुरक्षित हैं। शिर पर सात सर्प-फणों का फणाटोपन शिल्पित है, वक्ष पर उष्णीष चिह्न है, बाईं ओर के माल्यधारी का बहुभाग अवशिष्ट है, शेष परिकर भग्न व अप्राप्त है।

कायोत्सर्ग पार्श्वनाथ प्रतिमा तृतीय

कमलासन पर समपादासन में कायोत्सर्गस्थ लाल बलुआ पाषाण खंड में निर्मित इस प्रतिमा के कमल के आधार पर दोनों ओर चंवर ढुराते एक-एक यक्ष शिल्पित है, दोनों हाथ भग्न हैं, बड़ी-बड़ी सर्पकुंडलियां दोनों पार्श्वों में दृष्ट हैं मानो पीछे से कुंडली आधार देते हुए ऊपर को गई हैं और सिर पर सप्त फण मुकुट बनाया हुआ है। स्कंधों के दोनों ओर एक-एक आकृति है, जिनके सिर पर तीन-तीन सर्प फण आच्छादित हैं। शेष परिकर भग्न है। इसके साथ लगी पट्टिका के अनुसार यह प्रतिमा हिंगलगढ़ (मंदसौर) से प्राप्त हुई थी। इसका समय 11वीं सदी है।

पद्मासन पार्श्वनाथ प्रतिमा चतुर्थ

बलुआ पाषाण की यह तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा भैरासा (देवास ) से प्राप्त हुई है। सूचना पट्टिका में इसका समय 12वीं सदी बताया गया है। इस प्रतिमा के घुटने और फणाटोपन भग्न हैं। दोनों पार्श्वों में तीन-तीन विशाल सर्पकुंडलियां उत्कीर्णित हैं, जिससे यह पार्श्वनाथ प्रतिमा स्पष्ट है। वक्ष स्थल पर सुंदर श्रीवत्स और ग्रीवा पर त्रिवली टंकित है। कुंचित केश और स्कंधों पर लघु केश-लटिकाएं हैं। कर्ण भी स्कंधों को स्पर्शित करते हुए शिल्पित हैं।

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