दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -167 संगति हमेशा सोच-समझ कर करें: मूर्ख की सलाह मानकर निर्णय लेना वैसा ही है जैसे अमृत को विष समझ लेना


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 167वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


मूर्ख संग न कीजिए, लोह जली न तिराइ।

कदली सीप भुजंग मुख, एक बूंद तिहं भाइ।

कबीर दास जी इस दोहे में संगति (साथ) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि मूर्ख और अविवेकी व्यक्ति की संगति कभी नहीं करनी चाहिए। जिस प्रकार पदार्थ का स्वभाव उसके फल को निर्धारित करता है, वैसे ही संगति व्यक्ति के जीवन का परिणाम तय करती है।

यदि हम समाज में मूर्ख, असंयमी या दुष्ट लोगों के साथ रहेंगे, तो हमारी प्रतिष्ठा, विचारधारा और आचरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। जैसे लोहे का आग में जलना निश्चित है, वैसे ही मूर्ख की संगति से अपमान और पतन निश्चित है।

सत्संग का महत्व

संतजन कहते हैं – “सत्संगति किम् न करति” अर्थात सत्संग आत्मा का उत्थान करता है, जबकि असत्संग पतन की ओर ले जाता है। मूर्ख की संगति हमें ईश्वर-भक्ति से दूर कर सकती है, जबकि संतों की संगति हमें परमात्मा के निकट पहुंचाती है। नकारात्मक, संकीर्ण और असंतुलित सोच वाले लोगों के साथ रहने से प्रगति रुक जाती है। मूर्ख की सलाह मानकर निर्णय लेना वैसा ही है जैसे अमृत को विष समझ लेना।

आधुनिक संदर्भ

आज के समय में “संगति” का अर्थ केवल मित्र या पड़ोसी तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप ग्रुप, यूट्यूब चैनल और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म भी हमारी संगति का हिस्सा हैं। यदि हम नकारात्मक, झूठी या मूर्खतापूर्ण सामग्री से जुड़े रहते हैं, तो उसका असर सीधे हमारे विचारों और जीवन पर पड़ता है।

कबीर की वाणी हमें चेताती है कि – संगति सोच-समझकर करो, वरना ज्ञान भी अज्ञान में बदल सकता है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page