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मुनि दीक्षा लेकर एलक दयानंद जी बने शुद्धानंद सागर: आचार्यश्री वसुनंदी जी ने दी मुनि दीक्षा 


पदमपुरा में आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज के सानिध्य में रविवार को दिमनी चांदपुर निवासी ऐलक दयानंद सागर जी महाराज को मुनि पद की दीक्षा दी गई। दीक्षा के बाद उनका नाम मुनि शुद्धानंद सागर जी महाराज रखा गया। जनवरी 2025 में ऐलक पद की दीक्षा प्राप्त की थी। अंबाह से पढ़िए यह खबर…


अंबाह। पदमपुरा में आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज के सानिध्य में रविवार को दिमनी चांदपुर निवासी ऐलक दयानंद सागर जी महाराज को मुनि पद की दीक्षा दी गई। दीक्षा की प्रक्रिया दोपहर 2 बजे शुरू हुई। दीक्षा के बाद उनका नाम मुनि शुद्धानंद सागर जी महाराज रखा गया। मुनि बनने से पहले ऐलक दयानंद जी ने आचार्य श्री से दीक्षा की प्रार्थना की थी। आचार्य श्री ने स्वीकृति दी। अक्टूबर 2024 में उन्होंने वसुनंदी जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ली थी। जनवरी 2025 में ऐलक पद की दीक्षा प्राप्त की। इसके बाद रविवार को उन्हें मुनि पद की दीक्षा मिली। इस अवसर पर आचार्य वसुनंदी जी महाराज ने कहा कि दिगंबर अवस्था धारण किए बिना आत्मा परमात्मा नहीं बन सकती। मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं होती। हर इंसान दिगंबर रूप में जन्म लेता है। मृत्यु के बाद कफन हटाना भी दिगंबरता का प्रतीक है। शुद्धानंद मुनि श्री के परिजन संतोष जैन, नीलेश जैन, रूपेश जैन और दीपक जैन ने बताया कि हमारे पिताजी ने जैन धर्म की महानता से प्रेरित होकर सर्वाेच्च मुनि पद प्राप्त किया है।

अपने पद के अनुसार मूल गुणों का पालन करना होता है

दिगंबर मुनिराज भीषण ठंड, तपती धूप और मूसलधार बारिश जैसी विषम परिस्थितियों में भी संसार के सभी विकल्पों को त्याग कर आत्म कल्याण, आत्मानुभूति और आत्मान्वेषण के लक्ष्य की ओर जीवन शैली अपनाते हैं। वे जिन व्रतों, गुणों और तपों का पालन करते हैं, वह सभ्यता के इतिहास में पठनीय, चिंतन योग्य और मननीय है। जैन धर्म गुणवाचक है। इसी कारण जैन साधु बहिरंग और अंतरंग गुणों के विकास के लिए सतत जागृत और साधनारत रहते हैं। जैन मुनियों को आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी कहा जाता है। इन्हें अपने पद के अनुसार मूल गुणों का पालन करना होता है। इन्हीं गुणों के कारण उन्हें महाव्रती और महा तपस्वी कहा जाता है। आचार्य परमेष्ठी को 36 मूलगुणों का पालन करना होता है।

पांचों इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य

आचार्य परमेष्ठी को 36 मूलगुणों का पालन करना होता है। इनमें बहिरंग 6 तप, अंतरंग 6 तप और 12 तप शामिल हैं। ये हैं- अनशन, ऊनोदर, व्रत परिसंस्थान, रस परित्याग, कायकलेश, प्रायश्चित, विनय, वैय्यावृत्ति, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान। इन्हीं 36 मूल गुणों में पांच पंचाचार होते हैं- दर्शनाचार, ज्ञानाचार, तपाचार, चारित्राचार और वीर्याचार। साथ ही 10 धर्मों का पालन करना होता है- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य। छह आवश्यक- समता, वंदना, स्तुति, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कार्याेत्सर्ग के साथ तीन युक्तियां- मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति की साधना भी आवश्यक होती है। उपाध्याय और साधु परमेष्ठी 14 अंग, 14 पूर्व और 24 मूलगुणों के धारक होते हैं। साधु परमेष्ठी पांच महाव्रत- अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन करते हैं। वे पांच समितियां- ईर्या, भाषा, ऐष्णा, प्रतिस्थापना और व्युत्सर्ग समिति का पालन करते हैं। पांचों इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य होता है।

श्रमण सभ्यता मानव विकास की धरोहर

साधु के अन्य गुणों में केशलोच, नग्न रहना, स्नान नहीं करना, भूमि पर लेटना, दांत नहीं धोना, खड़े होकर हाथ में आहार लेना और दिन में एक बार आहार लेना शामिल है। वर्षा जैन ने बताया कि दिगंबर जैन मुनि यम, नियम, संयम और तपस्या के प्रमाणिक प्रज्ञापुरुष होते हैं। उनका जीवन अंतरंग साधना से जुड़ा होता है। वे जगत कल्याण की भावना से ओतप्रोत रहते हैं। भारतीय सभ्यता के इतिहास में श्रमण संस्कृति और श्रमण सभ्यता मानव विकास की धरोहर है। दिगंबर जैन मुनि तप और साधना के ऐसे प्रमाण पुरुष होते हैं, जिनका केवल दर्शन ही जीवन के अंधकार को मिटा सकता है।

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