आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हुई दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का समापन हुआ। इसमें भारत वर्ष से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित विनिश्चय आगमोदय आधारित ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत किए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में हुई दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का समापन हुआ। इसमें भारत वर्ष से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित विनिश्चय आगमोदय आधारित ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत किए। संगोष्ठी के द्वितीय दिवस सभी विद्वानों ने प्री-वेडिंग शूट नहीं होना चाहिए। इस पर जोर दिया इसके साथ ही रात्रि विवाह बंद होना चाहिए। इस पर भी जोर दिया गया कि जैन समाज की महिलाओं को सुंदरी प्रतियोगिता में भी नहीं जाना चाहिए। इस पर भी अपना आलेख प्रस्तुत किया। प्री वेडिंग के विषय में विद्वानों ने कहा कि इससे समस्याएं पैदा हो रही हैं और यह परंपरा बंद होनी चाहिए। विद्वानों ने इस बात का भी उल्लेख किया कि हमें मांसाहारी होटल आदि में भोजन नहीं करना चाहिए। यहां जहां दोनों तरह का भोजन होता हो, वहां भी भोजन नहीं करना चाहिए और ट्रेनों का भोजन बिल्कुल नहीं करना चाहिए क्योंकि, उसमें शाकाहारी एवं मांसाहारी वस्तुओं को एक साथ बनाया जाता है।
जिन मंदिर में ही विवाह हो,
आज हो रही को एजुकेशन जिसमें लड़का एवं लड़की एक साथ पढ़ते हैं। वह भी बंद होना चाहिए। साथ ही विवाह पद्धति पर कहा कि जिन मंदिर में ही विवाह हो, ऐसी परंपरा शुरू होना चाहिए। इसके साथ ही इस विषय पर बोलते हुए आचार्य श्री ने भी विद्वानों से चर्चा करते हुए कहा कि जैन संस्कृति को बचाने के लिए जैन समाज के स्कूल होने चाहिए। जो इतने अच्छे स्तर पर होना चाहिए। जिससे हमारा जैन दर्शन और जैन संस्कृति सुरक्षित रहेगी इसका लाभ भी होगा।
विद्वान वही होता है जो आगम की बात करता है
इस संगोष्ठी में यह भी बात आई विद्वान वही होता है जो आगम युक्त बात करता है। जो एक दूसरे पर दृष्टि रखता है वह कभी विद्वान नहीं होता। आचार्य श्री ने धर्म के सिद्धांतों का समावेश करने के साथ साथ अनुयोगों का वर्णन ग्रन्थ में सरल कर दिया। विद्वानों ने इस बात का भी उल्लेख किया। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने विनिश्चय आगमोदय ग्रंथ की रचना कर अनुयोगों के वर्णन के साथ धर्म के गुण सिद्धांत का समावेश कर इसका सरलीकरण किया है। उन्होंने इस ग्रंथ को उपयोगी बनाने के साथ कृति में पौराणिक एवं सैद्धांतिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी समाहित किया है।
अनुभव स्वाध्याय ज्ञान से आता है आचार्य श्री
आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने विद्वत संगोष्ठी में विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें वही मिलेगा जो कर्म फल होगा। हम इसे समझ नहीं पाते, इसलिए हम भटक रहे हैं। उन्होंने आचार्य श्री विराग सागर महाराज को स्मृति में लाते हुए विद्वानों को कहा कि आचार्य श्री कहते थे कि विद्वानों को एवं किसी को भी अहंकार नहीं करना चाहिए। ज्ञानी वही है जिसे अहंकार नहीं है। यदि हमें अहंकार नहीं है तो हमें ज्ञान मिलता है। यदि आ जाता है तो ज्ञान हमारा मार्ग अवरुद्ध कर देता है।
कीमत समय की है, समय बहुत कीमती है
कीमत समय की है, समय बहुत कीमती है। अनुभव हमें स्वाध्याय और ज्ञान से आता है। ज्ञान को हम इसलिए हासिल करते हैं कि हमें चारित्र की प्राप्ति हो। विद्वानों के विषय में कहा कि विद्वानों में विशेषता होनी चाहिए कि विषय की गहराई में जाएं आप जब विषय की गहराई में जाएंगे तब आप उसे समझेंगे। यदि विद्वान होंगे तो मंथन होगा, तीर्थंकर भगवान की वाणी का प्रचार होगा। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्य श्री विराग सागर महाराज एवं आचार्यों ने समाज को दिया। उन्होंने अच्छी कार्य पद्धति शैली से अनेक विद्वानों को तैयार किया है। उन्होंने आचार्य श्री विराग सागर महाराज को स्मृति में लाते हुए कहा कि आचार्य श्री एक ऐसा व्यक्तित्व रहे, जिनकी साधना सरलता की कोई सीमा नहीं है। उनके उपकारों को हम नही भूल सकते।
विराग स्मृति ग्रंथ का होगा प्रकाशन
इस अवसर पर समस्त विद्वानों ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज से आशीर्वाद लेते हुए आचार्य श्री विराग सागर महाराज की स्मृति मे उनके विषय पर आलेख उनके जुड़े हुए संस्मरणों को संकलित करने हेतु विराग स्मृति ग्रंथ के प्रकाशन करने हेतु आशीर्वाद लिया। दोपहर के सत्र का संचालन सुनील जैन संचय ने किया एवं अध्यक्षता प्रख्यात पंडित जयकुमार जैन निशांत ने की। अनेक विद्वानों ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। इसके साथ ही मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर ने भी अपने भाव प्रकट किए। मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने ग्रंथ के प्रशासन के विषय में सभी को बताया उन्होंने बताया कि ग्रंथ का 10 वर्ष पहले गाजियाबाद में विमोचन हुआ था। 2015 में यह प्रथम बार प्रकाशित हुआ द्वितीय बार यह 2018 में प्रकाशित हुआ उसके बाद यह भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशन में गुरुदेव की मेहनत है। गुरुदेव बताते गए और मैं लिखता गया। इस ग्रंथ में जो कुछ भी है यह सब गुरुदेव का है। आचार्य श्री ने स्वाध्याय करने की ओर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज को स्वाध्याय की बहुत जरूरत है क्योंकि, नहीं पढ़ने के कारण हमारी परंपराएं टूट रही हैं और व्यक्ति संस्कार से दूर हो रहे हैं। समाज को वक्ताओं की बहुत जरूरत है। जितना अच्छा लिखोगे उतने अच्छा है। वक्ता बनते चले जाओगे समाज को वक्ताओं और लेखन वालों की बहुत जरूरत है। अंत में सभी विद्वानों का सम्मान समाज की ओर से किया गया। समाज की और से संरक्षक अजीत सेठी ने सभी विद्वानों का आभार प्रकट किया।













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