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आचार्य पदारोहण दिवस पर विशेष : अहिंसा के सद प्रचारक हैं आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज 


21वीं सदी के दूरदृष्टा, अध्यात्मयोगी एवं चर्या शिरोमणि 108 आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज वर्तमान में श्रमण संस्कृति के सुविख्यात एवं बहुआदरित संत हैं। सन 2007 औरंगाबाद महाराष्ट्र में 31 मार्च महावीर जयंती के शुभ दिन गणाचार्य विराग सागर जी के द्वारा आपको आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। पढ़िए डॉ. जैनेंद्र जैन एवं राजेश जैन दद्दू का विशेष आलेख…


21वीं सदी के दूरदृष्टा, अध्यात्मयोगी एवं चर्या शिरोमणि 108 आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज वर्तमान में श्रमण संस्कृति के सुविख्यात एवं बहुआदरित संत हैं। आप अंतिम तीर्थंकर एवं वर्तमान शासन नायक भगवान महावीर स्वामी की परंपरा में हुए आचार्य आदि सागर अंकलीकर, आचार्य महावीरकीर्ति, आचार्य विमल सागर एवं आचार्य सन्मति सागर जी महाराज की निर्ग्रंथ वीतरागी दिगंबर जैन श्रमण परंपरा के प्रतिनिधि गणाचार्य विराग सागर जी महाराज से दीक्षित उनके बहुचर्चित श्रमण शिष्य हैं और अपनी आगम अनुकूल चर्या एवं ज्ञान से नमोस्तु शासन को जयवंत कर रहे हैं।

बाल्यावस्था में बढ़ाए संयम पथ पर कदम

आपका जन्म 18 दिसंबर, 1971 को मध्यप्रदेश के भिंड जिले के ग्राम रुर में हुआ। पारिवारिक संस्कार एवं आत्म रुचि के कारण बाल्यावस्था में ही आपने वैराग्य को जागृत कर संयम पथ पर पग बढ़ाएं और 17 वर्ष की अल्प आयु में ही गृह त्याग कर आप ब्रह्मचारी बन गए एवं श्रमणाचार्य गुरुवर विराग सागर जी से 11 अक्टूबर 1979 में क्षुल्लक दीक्षा, 19 जून 1991 को हीरो की नगरी पन्ना में ऐलक दीक्षा पश्चात 21 नवंबर 1991 को अत्यंत एकांत प्राकृतिक तीर्थ श्रेयांश गिरी की तलहटी में वटवृक्ष तले श्री विराग सागर जी के कर कमलों से जिनेश्वरी मुनि दीक्षा को प्राप्त किया। तदोपरांत सन 2007 औरंगाबाद महाराष्ट्र में 31 मार्च महावीर जयंती के शुभ दिन गणाचार्य विराग सागर जी के द्वारा आपको आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। यह आपका 16वां आचार्य पदारोहण दिवस है।

अधात्म सरोवर के राजहंस

आचार्य विशुद्ध सागर जी वर्तमान काल में अपने ज्ञान, अपनी विशुद्ध चर्या और आगम सम्मत पीयूष मयी विशुद्ध वाणी के प्रभाव से अध्यात्म सरोवर के राजहंस सिद्ध हो चुके हैं। आपके अलौकिक व्यक्तित्व में जहां गुरु गोविंद दोनों के दर्शन होते हैं वहीं आपके दीक्षा गुरु गणाचार्य विराग सागर जी के साथ-साथ श्रमण संस्कृति के महामहिम संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की छवि भी दिखाई देती है। आपका वात्सल्य और आपकी सरलता, सहजता भी ऐसी है कि जो भी आपके सानिध्य में आता है, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहता है और उन्हीं का होकर रह जाता है। आपके तप, त्याग, ज्ञान और निर्दोष चर्या और चरित्र को देखकर अब लोग उन्हें छोटे विद्यासागर भी मानने लगे हैं। आज यदि आचार्य विद्यासागर जी महाराज श्रमण संस्कृति के जेष्ठ एवं श्रेष्ठ शिरोमणि संत हैं तो आचार्य विशुद्ध सागर जी भी श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ और गौरवमयी संतों की श्रृंखला में चर्या शिरोमणि के रूप में स्थापित एवं बहु चर्चित और बहु आदरित आचार्य हैं।

आगम अनुकूल है चर्या

इस पंचम काल में अनेक जैन मुनि, आचार्य एवं उनके संघ साधनारत हैं, लेकिन वर्तमान में उनकी चर्या एवं कृतित्व में 20 वीं सदी का प्रभाव भी घुसपैठ करता दिखाई देता है लेकिन आचार्य विशुद्ध सागर जी एवं उनके द्वारा दीक्षित 50 से अधिक मुनियों का संघ इसका अपवाद है। उनकी आगम अनुकूल चर्या में सिर्फ और सिर्फ आगम की झलक ही दिखाई देती है और शिथिलाचार का कोई स्थान नहीं है। देश में कहीं भी उनके नाम से कोई प्रोजेक्ट भी नहीं है, इसलिए वे न तो धन संग्रह (चंदा) इकट्ठा करते हैं और न ही करवाते हैं। यही वजह है कि उनकी चर्या श्रावकों के लिए आदर्श एवं श्रमणों के लिए अनुकरणीय बन गई है।

आत्मा स्वभावं परभाव भिन्नम इस आध्यात्मिक सूत्र पर जीवन जीने वाले आचार्य विशुद्ध सागर जी का एकमात्र लक्ष्य आत्म कल्याण एवं दैनंदिनी कार्यक्रम ज्ञान, ध्यान, लेखन, प्रवचन और अध्ययन करना एवं संघस्थ मुनियों एवं ब्रह्मचारियों को अध्ययन कराना है। जन सामान्य को ज्ञानी कहने और प्रत्येक जीव आत्मा को भगवान मानने वाले तीर्थंकर सम उपकारी आचार्य विशुद्ध सागर जी उत्कृष्ट क्षयोपशम (श्रेष्ठ ज्ञान) धारी और विषयों से विरक्त तपस्वी एवं गहन चिंतक और दार्शनिक भी हैं। साल भर चलने वाली आपकी आगम अनुकूल और आडंबर विहीन निर्दोष चर्या मैं धर्म, दर्शन, ज्ञान, चरित्र और तप का विराट संगम आलोकित होता है। आपके चिंतन, प्रवचन एवं लेखन में भी जहां साक्षात सरस्वती उतरती दिखाई देती है वहीं हर एक वाक्य में विशुद्ध आगम व अध्यात्म झलकता है और आध्यात्मी आचार्य कुंद कुंद एवं महान दार्शनिक जैन आचार्य समंतभद्र के समन्वय की अनुगूंज भी ध्वनित होने के साथ-साथ मानव मात्र के कल्याण का संकल्प भी प्रकट होता है।

एक लाख किलोमीटर से अधिक पदविहार

आचार्यश्री का जितना विषद व्यक्तित्व है, उससे अधिक उनका कृतित्व भी है। देश के 12 राज्यों में लगभग 1,00,000 किलोमीटर से अधिक पग विहार कर चुके आचार्यश्री के सानिध्य में शताधिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं का संपन्न होना आपकी अरिहंत भक्ति का अभिज्ञान कराती है। आपके द्वारा शताधिक प्रवचन साहित्य के अलावा भाष्य, अनुशीलन, स्वतंत्र चिंतन, कथा साहित्य एवं 5000 से अधिक आध्यात्मिक कविताएं आदि विभिन्न प्रकार का पठनीय साहित्य सृजित है, जिसका देश विदेश में लाखों स्वाध्याय प्रेमियों के द्वारा स्वाध्याय किया जाता है।

टूटी आस्थाओं को जोड़ने वाली महायोगी

लाखों जैनेत्तरों को व्यसन एवं मांसाहार का त्याग कराने वाले आचार्य श्री अहिंसा के सद प्रचारक एवं टूटती आस्थाओं को जोड़ने वाले महायोगी हैं। आपके नाम के पूर्व आध्यात्म योगी का जो विशेषण अंकित किया जाता है वह न केवल सार्थक है वरन आपके व्यक्तित्व की दीपशिखा है जिससे उनके भक्तों को ढोंग का नहीं ढंग का एवं धर्म और अध्यात्म से परिपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त होती है । आज कटनी मध्य प्रदेश में विराजमान आचार्य श्री के 16 वें आचार्य पदारोहण दिवस पर कोटि-कोटि नमन।

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