रामगंजमंडी में वर्षायोग एवं पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न होने के बाद आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज का मंगल विहार हुआ। भक्तों ने नम आंखों से भावुक विदाई दी, गुरुदेव ने अंतिम उद्बोधन में धर्म से जुड़े रहने का संदेश दिया। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…
रामगंजमंडी में वर्षायोग और पंचकल्याणक महोत्सव के सफल आयोजन के बाद आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज का मंगल विहार आज दोपहर के समय हुआ। जैसे ही गुरुदेव विहार के लिए निकले, पूरे नगर का वातावरण भावुकता से भर गया और अनेक भक्तों की आंखें नम हो गईं। भक्तों ने हृदय से निकले भावों के साथ विदाई दी और गुरुदेव के पुनः आगमन की कामना की।
इस वर्षायोग को कई मायनों में विशेष माना गया। आचार्य श्री के सानिध्य में युवाओं, दंपत्तियों, श्रावकों और बालकों के लिए विविध धार्मिक संगोष्ठियों, सेमिनारों और संस्कार कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इन सभी आयोजनों में मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज और मुनि श्री 108 प्रत्यक्ष सागर महाराज का विशेष सहयोग रहा, जिससे पूरे समाज में धर्म की अलख जगाने का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
विहार से पूर्व आचार्य श्री ने भक्तों को चार सूत्रों का अमूल्य संदेश दिया— धार्मिक कार्य में सम्मान की इच्छा न करना, व्यवहार बिगड़ जाए पर धर्म न बिगड़े, देव-शास्त्र-गुरु के प्रति विकल्प न करना और निजात्मा का ध्यान रखना। गुरुदेव ने कहा कि संतों का विहार शुद्धता का प्रतीक है, रुकावट अशुद्धता को जन्म देती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की परंपराओं पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान मोबाइल युग की अव्यवस्थित जीवनशैली पर चिंता भी व्यक्त की।
अंतिम क्षण तक धर्म से जुड़े रहें और इसका त्याग न करें
विदाई के क्षणों में मुनि श्री प्रांजल सागर और मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर महाराज ने भावुक उद्बोधन दिए और रामगंजमंडी की श्रद्धा, भक्ति एवं सेवा भावना की मुक्तकंठ से सराहना की। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने अंतिम उपदेश में कहा कि गुरु का दृष्टिकोण लोकहित और आत्महित दोनों पर आधारित होता है, और जो गुरु को समझ लेता है, वह स्वयं को समझ लेता है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि जीवन के अंतिम क्षण तक धर्म से जुड़े रहें और इसका त्याग न करें। यह विदाई नगर के इतिहास में अविस्मरणीय क्षण बन गई और भक्तों की भक्ति-श्रद्धा सदैव स्मरणीय रहेगी।













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