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जब मृदुता आती है तभी प्रकट होता है उत्तम मार्दव धर्म – दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन : ऐसी पाठशाला होनी चाहिए जिसमें झुकना सिखाया जाए – आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज


रामगंजमंडी में दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन उत्तम मार्दव धर्म की पूजा और आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के मंगल प्रवचन के साथ मनाया गया। आचार्य श्री ने कहा कि झुकना ही धर्म है और अहंकार जीवन से धर्म को मिटा देता है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की खास रिपोर्ट…


रामगंजमंडी। दसलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म का उत्सव श्रद्धा और भक्ति से मनाया गया। आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि जीवन में मृदुता आने पर ही मार्दव धर्म प्रकट होता है। उन्होंने कहा – “ऐसी पाठशाला होनी चाहिए जिसमें झुकना सिखाया जाए, क्योंकि झुकना ही सच्चा धर्म है। यदि झुकेंगे नहीं तो मार्दव धर्म प्रकट नहीं हो सकता। आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि अहंकार के कारण इंसान धीरे-धीरे मार्दव धर्म को खोता जा रहा है। मान-सम्मान और दिखावे के चलते झुकने का भाव खत्म हो रहा है। “मकान बड़े होते जा रहे हैं और दरवाजे ऊँचे बन रहे हैं, क्योंकि इंसान का अहंकार बढ़ता जा रहा है,” उन्होंने कहा।

अहंकार परिवारों को तोड़ देता है 

उन्होंने कहा कि केवल सिर झुकाने से नहीं, बल्कि मन से झुकना जरूरी है। मन में सरलता और विनम्रता हो तभी मार्दव धर्म का प्राकट्य होता है। अहंकार परिवारों को तोड़ देता है और बैर पैदा करता है। दुर्योधन का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने बताया कि अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है। मुनिश्री ने कहा – “जिसे परीक्षा देना नहीं आता, उसे पढ़ना-लिखना भी नहीं आता। यदि संयम और नियम को अपनाना सीख लें, तो आत्मा की असीम शक्ति प्रकट हो सकती है। उन्होंने अंत में कहा कि जीवन में जब भी बड़े-बुजुर्गों को देखें तो झुकने का भाव रखना चाहिए। अहंकार मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ता, इसलिए मन से नम्रता और झुकाव ही सच्चा धर्म है।

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