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आचार्य विद्यासागर एक तपस्वी की स्मृति और राष्ट्र की आत्मा : भारत केवल एक भूखंड नहीं, एक भाव है


मृत्यु मनुष्य को एक बार मारती है, परन्तु महापुरुषों के जाने का समाचार हमें बार-बार मारता है। जब किसी साधारण व्यक्ति का देहावसान होता है, तो घर की चौखट सूनी होती है; पर जब कोई संत, कोई तपस्वी, कोई युगपुरुष विदा लेता है, तो सम्पूर्ण समाज की आत्मा सूनी हो जाती है। जयेन्द्र जैन’निप्पू चन्देरी’ का पढ़िए यह आलेख…


चंदेरी। मृत्यु मनुष्य को एक बार मारती है, परन्तु महापुरुषों के जाने का समाचार हमें बार-बार मारता है। जब किसी साधारण व्यक्ति का देहावसान होता है, तो घर की चौखट सूनी होती है; पर जब कोई संत, कोई तपस्वी, कोई युगपुरुष विदा लेता है, तो सम्पूर्ण समाज की आत्मा सूनी हो जाती है। आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज के दूसरे समाधि दिवस पर यह शून्य फिर से बोल उठता है—वह शून्य, जो शब्दों से नहीं, संवेदना से भरा है।

आचार्य श्री केवल एक मुनि नहीं थे; वे युग की चेतना थे। उनके चरण जहाँ पड़े, वहाँ केवल धर्म का दीपक नहीं जला, बल्कि राष्ट्रीयता का प्रदीप भी प्रज्वलित हुआ। उन्होंने धर्म को मठों की दीवारों में बंद नहीं किया; उसे गाँव की चौपाल तक पहुँचाया। गौशाला की सेवा हो, चरखे की महिमा हो, श्रमदान का आह्वान हो, या स्वदेशी का उद्घोष—उनकी वाणी में अध्यात्म और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक बन जाते थे।

वे कहा करते थे—“अंग्रेज़ी नहीं, हिंदी बोलो; इंडिया नहीं, भारत बोलो।” यह केवल भाषा का आग्रह नहीं था, यह आत्मसम्मान का मंत्र था। उन्होंने हमें याद दिलाया कि जो राष्ट्र अपनी भाषा से लज्जित होता है, वह अपनी आत्मा से भी दूर हो जाता है। भारत केवल एक भूखंड नहीं, एक भाव है, एक संस्कृति है, एक सनातन प्रवाह है।

उनका जीवन तप का पर्याय था। कठोर व्रत, नंगे पाँव विहार, अल्पाहार और अपार अध्ययन—इन सबके बीच उन्होंने साहित्य की ऐसी धारा प्रवाहित की, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ प्रदर्शक बन गई। वे अध्यात्म और ज्ञान के ऐसे पुंज थे, जिनकी आभा में अनेक युवाओं ने जीवन का लक्ष्य पाया।

गौशालाओं के प्रति उनका स्नेह केवल धार्मिक भावना नहीं था; वह ग्राम्य जीवन की रक्षा का संकल्प था। चरखे की बात उन्होंने इसलिए की कि आत्मनिर्भरता केवल अर्थनीति का विषय नहीं, आत्मगौरव का प्रश्न है। श्रमदान का आह्वान उन्होंने इसलिए किया कि समाज सेवा बिना श्रम के केवल भाषण बनकर रह जाती है।

आज जब हम उनके दूसरे समाधि दिवस पर उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, आत्मपरीक्षण का क्षण भी है। क्या हमने उनके बताए मार्ग पर चलने का साहस किया? क्या हमने स्वदेशी को केवल नारे तक सीमित रखा, या उसे जीवन का अंग बनाया? क्या हमने हिंदी और भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया, या सुविधा के आगे झुका दिया?

आचार्य श्री का जीवन हमें सिखाता है कि अध्यात्म पलायन नहीं, परिवर्तन का साधन है। तप केवल आत्मशुद्धि नहीं, समाजशुद्धि का माध्यम भी है। उन्होंने अपने संयम से यह सिद्ध किया कि त्याग में ही सच्ची शक्ति है।

उनकी मृत्यु का समाचार हमें इसलिए मारता है कि वह हमारे भीतर के आलस्य, हमारी जड़ता, और हमारी आत्मविस्मृति को उजागर कर देता है। परंतु यदि हम उनकी स्मृति को संकल्प में बदल दें, तो वही समाचार हमें जीवन भी दे सकता है।

आज आवश्यकता है कि उनके विचारों को केवल पुस्तकों में न रखा जाए, बल्कि विद्यालयों, गौशालाओं, ग्राम सभाओं और युवा मंचों तक पहुँचाया जाए। राष्ट्र और धर्म के समन्वय का जो आदर्श उन्होंने प्रस्तुत किया, वही भारत की सच्ची पहचान है।

दूसरे समाधि दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

वे शरीर से दूर हुए हैं, परंतु विचारों से आज भी हमारे बीच हैं—दीपक की लौ की तरह, जो अंधकार में भी दिशा देती है।

आइए, उनके चरणों में श्रद्धा अर्पित कर यह प्रण लें कि भारत को भारत ही कहेंगे, स्वदेशी को अपनाएँगे, श्रम को पूजा मानेंगे और अध्यात्म को जीवन का आधार बनाएँगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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