आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित सप्त ऋषि संघ का 55 वर्षों बाद शिवाड़ में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्मसभा में आचार्यश्री ने राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और मोहनीय कर्म को त्यागने को ही शिव यानी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया। शिवाड़ में दो संघों के ऐतिहासिक वात्सल्य मिलन का दृश्य भी देखने को मिला। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
टोंक/शिवाड़। धर्मपरायण शिवाड़ नगर की पुण्य भूमि पर पाँच दशकों से अधिक समय बाद वह ऐतिहासिक क्षण आया जब प.पू. आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज सप्त ऋषि मुनि संघ सहित नगर में मंगल प्रवेश किया। 55 वर्ष पूर्व वे अपने दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज के साथ मुनि अवस्था में शिवाड़ आए थे, और आज आचार्य पद अलंकरण के बाद पहली बार नगर में प्रवेश हुआ।
नगर में आयोजित विशाल धर्मसभा में आचार्यश्री ने शिवाड़ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए कहा कि ‘शिव’ अर्थात मोक्ष और ‘आड़’ अर्थात परिवारजनित तथा मन की बाधाएँ। जब मनुष्य राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ व मोहनीय कर्म की आड़ को दूर कर लेता है, तभी सच्चे अर्थों में ‘शिव’ अर्थात मोक्ष मार्ग प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि संसार में सुख नहीं है, सुख केवल संयम, त्याग और वैराग्य से मिलता है।
उन्होंने नगर गौरव मुनि श्री नाभिनंदी जी के तप और संयम की प्रशंसा करते हुए बताया कि उन्होंने मनोबाधाओं को जीतकर साधुपद प्राप्त किया है, जो समाज के लिए प्रेरणास्वरूप है।
प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी का यह आगमन नगर के लिए सौभाग्य का क्षण बना। उनके साथ मुनि श्री हितेंद्रसागर जी, मुनि श्री चिंतनसागर जी, मुनि श्री भुवनसागर जी तथा आर्यिका श्री विनम्रमति, आर्यिका श्री प्रणतमति और आर्यिका श्री निर्मोहमति जी भी शामिल रहे।
मुख्य बाजार में श्री चंद्रप्रभु मंदिर के दीपक, महेश, आशीष, संदीप, अंकित, गंभीरमल परिवार सहित अनेक समाजजनों ने चरण प्रक्षालन कर गुरुदेव का स्वागत किया। शोभायात्रा में महिलाओं की मंगल कलश यात्रा, घर-घर बने स्वागत द्वार, रंगोलियाँ और प्रभु भक्ति के दृश्य पूरे नगर को भक्तिमय बना रहे। निवाई, टोंक, बोली, पीपल्दा सहित कई नगरों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पधारे।
शिवाड़ में दो संघों का भव्य वात्सल्य मिलन
19 नवंबर की दोपहर शिवाड़ में दो संघों का ऐतिहासिक व आत्मीय वात्सल्य मिलन हुआ। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 इन्द्रनंदी जी महाराज के शिष्य बालाचार्य श्री 108 निपूर्णनंदी जी महाराज, मुनि श्री निर्मलनंदी जी और शिवाड़ गौरव मुनि श्री नाभिनंदी जी महाराज ससंघ ने दर्शन-भक्ति के साथ गुरुवर के चरण प्रक्षालन किए। मुनि श्री नाभिनंदी जी का दीक्षा के बाद यह पहला नगर प्रवेश रहा।
समाज ने पूर्व में टोंक व अन्य नगरों में जाकर आचार्यश्री को शिवाड़ आगमन हेतु श्रीफल अर्पित कर विनम्र निवेदन किया था, जिसके फलस्वरूप यह दिव्य अवसर संभव हुआ। मंदिर में आचार्यश्री के आशीर्वचन हुए और पूरे नगर में भव्य स्वागत-दृश्य देखने को मिले।













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