आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जीवन संयम, तप, करुणा और धर्मप्रभावना का अद्वितीय उदाहरण है। 75वें जन्मदिवस पर उनका यह जीवनवृत्त समाज के लिए प्रेरणा, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश है। पढ़िए राजेश पंचोलिया का विशेष आलेख….
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में संयम, तप और करुणा के प्रतीक आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अपने साधु जीवन के 57 वर्षों में जिनधर्म की अखंड ज्योति प्रज्वलित की है। मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री ने राष्ट्रभर में धर्मप्रभावना का अद्वितीय कार्य किया। 18 सितम्बर 1950 को जन्मे यह महामानव भादवा सुदी सप्तमी को 75वें अवतरण दिवस पर प्रवेश कर रहे हैं। उनकी साधना, उपसर्गों पर विजय, तप और वात्सल्य ने उन्हें समाज के लिए प्रेरणा का आधार बना दिया है।
परंपरा और दीक्षा
20वीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा में तृतीय पट्टाधीश आचार्य 108 श्री धर्मसागर जी से दीक्षित होकर, इस परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज बने।
उनकी दीक्षा 24 फरवरी 1969 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) को श्री महावीर जी में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज से हुई।
जन्मभूमि और बाल्यकाल
आचार्य श्री का जन्म मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के सनावद नगर में हुआ, जो कई सिद्धक्षेत्रों के निकट स्थित है।
उनकी माता श्रीमती मनोरमा देवी जैन और पिता श्री कमलचंद जी जैन (पोरवाड़ उपजाति) थे। यशवंत नाम से जन्मे यह बालक अपने परिवार की 13वीं संतान थे। माता-पिता ने महावीर जी मंदिर में मन्नत मांगी थी कि यदि संतान जीवित हुई तो उसका मुंडन वहीं कराएंगे। बाद में यही स्थान उनकी मुनि दीक्षा का पावन स्थल बना।
प्रारंभिक जीवन और संत-समागम
मात्र 12 वर्ष की आयु में माता का असामयिक निधन हो गया।
युवावस्था में वे कई आचार्यों और आर्यिकाओं के संपर्क में आए। मई 1968 में संघ से जुड़ गए और आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज से गृहत्याग का नियम लिया।
उपसर्ग और नेत्रज्योति की पुनः प्राप्ति
दीक्षा के बाद मात्र 19 वर्ष की उम्र में उनकी नेत्र ज्योति चली गई। डॉक्टरों ने इंजेक्शन के बिना दृष्टि लौटने की संभावना न के बराबर बताई। लेकिन मुनि श्री ने संकल्प किया कि वे उपचार नहीं कराएंगे।
लगातार 3 घंटे तक श्री शांति भक्ति का पाठ करने और प्रभु भक्ति की प्रभावना से 52 घंटे बाद उनकी नेत्र ज्योति लौट आई। यह घटना आज भी भक्तों के लिए आस्था का आधार है।
आचार्य पद
24 जून 1990 (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को राजस्थान के पारसोला में, आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के लिखित आदेश से उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। 57 वर्ष के साधु जीवन में उन्होंने देशभर में धर्मप्रभावना की और अनेक तीर्थ क्षेत्रों में चातुर्मास व विहार किए।
दीक्षाएं और पंचकल्याणक
अब तक आचार्य श्री ने 117 दीक्षाएं दी हैं – जिनमें 41 मुनि, 45 आर्यिका, 15 ऐलक-क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका शामिल हैं। उन्होंने 70 से अधिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं कराई हैं।
विशेष योगदान
57 वर्षों में 70 से अधिक सल्लेखनाएं कराई हैं। उनकी विचारधारा – “हम हमारी छोड़ेंगे नहीं, औरों की बिगाड़ेंगे नहीं” – समाज के लिए प्रेरणादायी रही है।
उपाधियां
समाज ने उन्हें अनेक उपाधियां प्रदान कीं – आचार्य शिरोमणि, वात्सल्य वारिधि, राष्ट्र गौरव, तपोनिधि, संस्कृति संरक्षक, जिनधर्म प्रभावक इत्यादि।
महामस्तकाभिषेक में मार्गदर्शन
आचार्य श्री ने 1008 श्री गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक (1993, 2006, 2018) और 2022 में श्री महावीर स्वामी के महामस्तकाभिषेक में प्रमुख सानिध्य और मार्गदर्शन प्रदान किया।
विलक्षण प्रसंग
-1994 में श्रवण बेलगोला से कनकगिरि विहार के दौरान देवों ने सर्प रूप में आचार्य श्री का मार्ग रोका। बाद में क्षेत्र विकास के संकेत मिले।
-1988 में भिंडर में गुरु-शिष्य मिलन का भावपूर्ण प्रसंग घटित हुआ, जब आचार्य अजितसागर जी के चरणों को वर्धमान सागर जी के अश्रुओं ने अभिषिक्त किया और बदले में आचार्य श्री के अश्रु आशीर्वाद शिष्य के मस्तक पर गिरे।













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