टोंक में आयोजित धर्मसभा में आचार्य वर्धमान सागर जी ने संयम, निष्ठा और धर्म ध्यान के महत्व पर प्रकाश डाला। आपने मुनि सौम्य सागर जी की संलेखना समाधि की प्रशंसा की और चार प्रकार के ध्यान पर शिष्यों को जागरूक किया। पढ़िए विकास जैन की ख़ास रिपोर्ट…
टोंक। नगर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्म, संयम और गुरु-शिष्य परंपरा पर गहन प्रवचन देते हुए कहा कि गुरु के सानिध्य में निष्ठा और समर्पण से की गई साधना ही शिष्य को जीवन के उच्चतम लक्ष्य तक पहुंचाती है।”
आचार्य श्री ने जन्म, मरण और बुढ़ापे के अनिवार्य चक्र की चर्चा करते हुए चार प्रकार के ध्यान— रौद्र, तिर्यंच, धर्म और शुक्ल ध्यान के चार-चार भेदों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि रौद्र ध्यान से तिर्यंच और नरक गति की प्राप्ति होती है, जबकि धर्म ध्यान और पंच परमेष्ठी की आराधना जीवन को मोक्षमार्ग की ओर ले जाती है।
यम संलेखना समाधि को आदर्श बताया
अपने प्रवचन में आपने निकटवर्ती टोडाराय सिंह से पधारे मुनि श्री सन्मति सागर जी एवं मुनि श्री सौम्य सागर जी का उल्लेख करते हुए मुनि सौम्य सागर जी की यम संलेखना समाधि को आदर्श बताया—जिन्होंने चारों आहारों का त्याग कर 10 उपवास के पश्चात समाधि प्राप्त की। इससे पूर्व आर्यिका श्री निर्मुक्त मति जी ने ध्यान के चार भेदों की गूढ़ व्याख्या की, वहीं आर्यिका वत्सल मति माताजी ने चातुर्मास को नगर समाज के लिए पुण्यकारी बताया और आचार्य श्री का गुणानुवाद किया। समाज प्रवक्ता पवन कंटान और विकास जागीरदार ने जानकारी दी कि टोडाराय सिंह से पधारे गुरु भक्तों ने भगवान और पूर्वाचार्यों के चित्रों का अनावरण कर दीप प्रज्वलन और चरण प्रक्षालन के साथ जिनवाणी भेंट का सौभाग्य प्राप्त किया।













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