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आचार्य श्री विनिश्चिय सागर जी ने किया पत्रकारों को संबोधित: समझ के माध्यम से कुरीतियों का विरोध करें 


आचार्य श्री विनिश्चिय सागरजी नगर में विराजमान हैं। आचार्य श्री की 13 तारीख को कृषि उपजमंडी में वर्षा योग कलश स्थापना होगी। इसके लिए पत्रकारों को भी दिगंबर जैन समाज ने आमंत्रित किया। आचार्य श्री ने सभी पत्रकारों को आशीर्वाद दिया और सभी पत्रकारों को कहा कि समझ के माध्यम से कुरीतियों का विरोध करें। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चिय सागरजी नगर में विराजमान हैं। आचार्य श्री की 13 तारीख को कृषि उपजमंडी में वर्षा योग कलश स्थापना होगी। इसके लिए पत्रकारों को भी दिगंबर जैन समाज ने आमंत्रित किया। आचार्य श्री ने सभी पत्रकारों को आशीर्वाद दिया और सभी पत्रकारों को कहा कि समझ के माध्यम से कुरीतियों का विरोध करें। पत्रकार अपनी दृष्टि से देखते हुए अपने लेख के द्वारा नेक कार्य करता है। उनकी कलम की ताकत, सच्चाई से परिचय कराती है। आप धन्यवाद और आशीर्वाद के पात्र हैं। आप ईमानदारी से कलम चलाएं और आपकी कलम सच्चे तरीके से लोगों तक पहुंचे। जैन दर्शन अहिंसा का पालन करने की सीख देता हैं। उन्होंने पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए चातुर्मास के संबंध में बताया कि सबसे ज्यादा पर्व चाहे हिंदू संप्रदाय हों, चाहे जैन संप्रदाय हो, चातुर्मास में आते हैं। आत्म साधना एवं बरसात में जीवों की उत्पति ज्यादा होती है। जैन साधु चातुर्मास करते हैं।

एक बार गुरुदेव के साथ विहार में गया तो वापस नहीं आया 

जीवन परिचय के बारे में पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मेरे गुरु आचार्य श्री विराग सागर महाराज हैं। जब में पढ़ता था तो मेरा धर्म से लगाव कम था। पहाड़ी की तरफ गए घूमने के लिए दोस्तों के साथ होटल में खाना भी खा लेंगे लेकिन, मुझे नहीं पता था कि यह मेरा होटल का आखिरी खाना होगा। यह मूवी मेरी आखिरी मूवी होगी। उसके बाद हम लोग शाम को गुरुदेव के दर्शन करने पहुंचे। गुरुदेव की दृष्टि मुझ पर पड़ी और मुझसे कहा कि इधर आओ उनका एक स्वभाव था। युवाओं को जोड़ने का उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा-मेरे साथ में विहार में चलना है। मेरा मन तो नहीं था लेकिन, मैं उनके साथ चल दिया। दो-तीन किमी उनके साथ चला। उन्होंने मुझे दो-तीन बार पूछा क्या करना चाहते हो ? लेकिन मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया। अचानक मेरा मन हुआ कि थोड़ा और चलते हैं। धीरे-धीरे करके मेरे सारे मित्र चले गए। मैं उनके साथ चला 12-13 किमी का विहार था। जब आखिरी पड़ाव था तो उन्होंने मुझसे कहा रुकोगे कि जाओगे। बस वो रात्रि थी लौटकर वापिस नहीं आया। लगा सब कुछ इनका जैसे बनने में ही है। चर्या देखी, उनको समझा। उनसे प्रश्न किए। समाधान मिला। मन परिवर्तित हो गया और गुरुदेव ने मुझे आगे जाकर मुनि दीक्षा दी। उन्होंने कहा कि आचार्य विराग सागर महाराज के वर्तमान में 500 शिष्य हैं। उनका एक वर्ष पूर्व समाधि मरण हो चुका है। उन्होंने कहा जैन धर्म अपनाने की नहीं अहिंसा के मार्ग पर चलने की बात करता है। इस अवसर पर दिगंबर जैन समाज के द्वारा सभी पत्रकारों का स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।

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