प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्टपरंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जयपुर के उपनगरों में विहार चल रहा है। 6 मार्च को आहार के बाद श्री शांतिनाथ जिनालय नांगलिया बिलवा से 5 किमी विहार कर जेडी टीटी कॉलेज गोनेर पुलिया के पास सीतापुरा में रात्रि विश्राम हुआ। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
जयपुर। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्टपरंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जयपुर के उपनगरों में विहार चल रहा है। 6 मार्च को आहार के बाद श्री शांतिनाथ जिनालय नांगलिया बिलवा से 5 किमी विहार कर जेडी टीटी कॉलेज गोनेर पुलिया के पास सीतापुरा में रात्रि विश्राम हुआ। 7 मार्च को प्रातः 5 किमी विहार कर धनवंतरि आर के संत भवन सेक्टर 10 प्रतापनगर में आहारचर्या होगी। प्रवचनसार गाथा की विवेचना में आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने बताया कि यह संसारी जीव अनेक गतियो में परिभ्रमण कर अलग-अलग पर्याय में नूतन शरीर को धारण करता है। शरीर के प्रति अंतरंग मोह के कारण जीव शरीर धारण करता है। संसारी आत्मा के कर्मों के उदय में आने से एक गति से दूसरी गति एक इंद्रीय से पांच इंद्रीय पर्याय प्राप्त होती है। राजेश पंचोलिया और लोकेश गजराज के अनुसार इन गतियो में विषय भोग की अधिकता के कारण शरीर भी रागी हो जाता है, मोह और ममता भाव के कारण अनंतकाल तक यह जीव भ्रमण करता है। संसारी जीव को जब सम्यक गुरु का उपदेश मिलता है। तब संसार शरीर भोगों को वह असार समझ संयम धारण कर मोह ,ममता को त्याग़ने ममता की डोरी टूटते ही कर्मों का नष्ट होना प्रारंभ हो जाता है।













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