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आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का शिवदासपुरा में हुआ प्रवेश : 6 मार्च को आचार्य संघ की आहार चर्या बिलवा दिगंबर जैन मंदिर में होगी


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पदमपुरा से 5 मार्च को शिवदासपुरा प्रवेश हुआ। आहार के बाद दोपहर को विहार कर 1008 श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर विमल परिसर नांगलिया बिलवा गांव में मंगल प्रवेश हुआ। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पदमपुरा से 5 मार्च को शिवदासपुरा प्रवेश हुआ। आहार के बाद दोपहर को विहार कर 1008 श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर विमल परिसर नांगलिया बिलवा गांव में मंगल प्रवेश हुआ। 6 मार्च को आचार्य संघ की आहार चर्या बिलवा दिगंबर जैन मंदिर में होगी। 5 मार्च को प्रातः श्रीजी के अभिषेक के बाद जयपुर के अनेक मंदिरों के समाज जनों ने आचार्य श्री के दर्शन कर अपनी अपनी कॉलोनी मंदिर पधार कर धर्मलाभ देने के लिए निवेदन किया। ग्राम चंदलाई के सुमति, निर्मल छाबड़ा ने समाधिस्थ मुनि शिष्य देवेश सागर जी की जन्म नगरी पधारने का निमंत्रण दिया।

 इंजीनियर युवा ने लिया शुद्ध जल ग्रहण का नियम

गुरुभक्त राजेश पंचोलिया इंदौर के अनुसार सनावद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित 19 महाव्रती की जन्मभूमि है। त्याग वैराग्य, संयम की गौरव शाली परम्परा में सनावद के 33 वर्षीय नवयुवक इंजीनियर शानिल सुपुत्र संगीता श्रीमंदर जैन (बडूद )सनावद ने शिवदासपुरा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से यज्ञोपवीत जनेऊ धारण कर आजीवन शुद्ध जल ग्रहण करने का नियम लेकर आचार्य श्री को आहार भी दिया।

जब तक ममता है तब तक संसार है 

इस अवसर पर श्रीमंदर( पापा), राजा (चाचा), संगीता (मम्मी) सपना ( चाची) भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। ब्रह्मचारी लोकेश गजराज ने बताया कि दोपहर को प्रवचन सार ग्रन्थ के स्वाध्याय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि संसारी प्राणी मोह के वशीभूत होकर संसार में परिभ्रमण करता है। यह मेरी माता,पत्नी, घर भाई,पुत्र, पिता,मेरी धन दौलत है। मेरा सुख है, इस प्रकार ममता, मोह,राग रूपी अंधेरे के वश में होकर ऐसा प्राणी सुख प्राप्ति के कारण रूप अपने हित से दूर रहता है। संसारी प्राणी अपनी आत्मा के कल्याण से विमुख होकर रागद्वेष के भीतर पड़ा रहता है और मुक्ति के कारण विकार रहित होकर जिनेंद्र के वचनों में रमन नहीं करता है। इस तरह जब तक ममता है तब तक संसार है संसार के दु:खों को भ्रमण का कारण जानकार इससे ममता छोड़कर अपने शुद्ध आत्मा स्वरूप में स्थित होकर निजानंद का लाभ करना चाहिए।

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