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58वें अवतरण दिवस पर विशेष आलेख : मेरे गुरुदेव आचार्य श्री वसुनंदी जी महामुनिराज 


परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री 108 वसुनंदी जी महाराज के रूप में भारत वर्ष ही नहीं बल्कि विश्व में सत्य, अहिंसा, शाकाहार, भाईचारे का संदेश देते हुए जैन धर्म और जैन सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करते हुए जैन ध्वजा को फहरा रहे हैं। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट..


मुरैना| आश्विन कृष्ण अमावस्या 3 अक्टूबर 1967 को राजस्थान के जिला धौलपुर में कस्बा मनियां के नजदीक ग्राम विरौधा में दिगम्बर जैसवाल जैन (उपरोचियां) समाज के श्रावक श्रेष्ठी ऋषभचंद जी जैन के आंगन में मातुश्री श्रीमती त्रिवेणी देवी जैन की कोख से एक बालक का जन्म हुआ। दिनेश चंद जैन नामकरण हुआ, जो कि आज परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री 108 वसुनंदी जी महाराज के रूप में भारत वर्ष ही नहीं बल्कि विश्व में सत्य, अहिंसा, शाकाहार, भाईचारे का संदेश देते हुए जैन धर्म और जैन सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करते हुए जैन ध्वजा को फहरा रहे हैं।

बालक दिनेश बचपन से ही धीर, वीर और गंभीर प्रवृत्ति के थे। आपकी प्रारंभिक लौकिक शिक्षा ग्राम विरोधा, मनियां में हुई। आपने धौलपुर राजस्थान से बी.कॉम की परीक्षा उत्तीर्ण की। आप गृह कार्यों के साथ-साथ प्रतिदिन जिनेंद्र प्रभु के अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय में लीन रहते थे। अल्प आयु (1979) में ही आपके हृदय में वैराग्य का बीज अंकुरित होने लगा था।

सन् 1988 के प्रारंभ में दिनेश के गृह नगर मनियां में परम पूज्य निमित्त ज्ञानी समाधिस्थ आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज का ससंघ मंगल आगमन हुआ। आचार्य श्री के संघ में एक युवा मुनिराज श्री विरागसागर जी महाराज को देखकर युवा बालक दिनेश काफी प्रभावित हुआ और वैराग्य का बीज पूर्णता के साथ अंकुरित होने लगा। पूज्य युवा मुनिराज का सान्निध्य मिला और युवक दिनेश ने दृढ़ता के साथ वैराग्य पथ पर चलने की ठान ली। कुछ दिन बाद संघ का विहार हो गया, युवा दिनेश मनियां अपने घर पर ही रुक गए, लेकिन घर पर उनका मन कहां लगने बाला था। इसी बीच आचार्य श्री विमल सागर जी का संघ मुरैना पहुंचा और लगभग एक माह रुककर धर्म प्रभावना की। इसी बीच युवक दिनेश मुरैना पहुंचे और युवा मुनिराज विराग सागर जी का सान्निध्य प्राप्त किया। अतिशय क्षेत्र सिहोनियां जी में 18 मई 1988 को श्री 1008 भगवान शांतिनाथ जी के दरबार में युवा दिनेश ने आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज को श्रीफल अर्पित कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर ब्रह्मचारी दीक्षा ग्रहण की।

आपने 16 नवम्बर 1988 को अतिशय क्षेत्र बरासों जिला भिंड (म .प्र.) में मुनि श्री विराग सागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की, नामकरण हुआ क्षुल्लक श्री जिनेन्द्र सागरजी महाराज। बुधवार 11अक्तूबर 1989 आश्विन सुदी 11 वि.संवत 2046 को श्री दिगम्बर जैन मंदिर, नसिया जी, भिंड में मुनिश्री श्री विराग सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा लेकर अपनी मनुष्य पर्याय को धन्य किया। नामकरण हुआ मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज।

राष्ट्रसंत श्वेत पिच्छाचार्य आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ने 17 फरवरी 2002 बसंत पंचमी को विश्वास नगर पंचकल्याणक, दिल्ली में आपको उपाध्याय की उपाधि से अलंकृत किया। आचार्य श्री विद्यानंदजी महामुनिराज ने 01 अप्रेल 2009 को एलाचार्य की उपाधि से विभूषित कर नामकरण किया एलाचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज। कुंद कुंद भारती दिल्ली में 03 जनवरी 2015 को आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ने आपको आचार्य पद देकर उपकृत किया। पूज्य गुरुदेव अभीक्षण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज ने अभी तक भारत वर्ष के 10 से अधिक राज्यों में पद विहार करते हुए 37 नगरों में वर्षायोग कर धर्म प्रभावना की है। पूज्य श्री ने संयम की साधना करते हुए शताधिक दीक्षायें प्रदान की हैं। आपने अपनी लेखनी से आगमानुसार 300 से अधिक ग्रंथों को तैयार किया है। आपके होनहार, सुयोग्य शिष्यों द्वारा सम्पूर्ण भारतवर्ष में अहिंसा, शाकाहार, जीव दया का प्रचार प्रसार कर जैन धर्म की प्रभावना की जा रही है। वर्तमान में पूज्य आचार्य श्री ससंघ सुहाग नगरी फिरोजाबाद में चातुर्मासरत हैं। पूज्य श्री के सुयोग्य शिष्य युगल मुनिराज श्री शिवानंद जी महाराज एवम मुनिश्री प्रश्मानंद की महाराज संस्कारधानी नगरी मुरैना में चातुर्मारत हैं।

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