अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट…
दमोह। साइंस आफ लिविंग के इस सत्र में हम अध्यात्म का सही रहस्य जानने का प्रयास करेंगे। अध्यात्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है अधि + आत्मा = अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में अथवा आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला। आचार्य कहते है अपने शुद्धात्मा में विशुद्धता का आधारभूत अनुष्ठान या आचरण अध्यात्म है। अध्यात्म में वर्तन करना बहुत सरल है पर इतना सरल होते हुये भी इसका अनुपालन कठिनतम लगता है। आचार्य कहते है कुछ नही करने का नाम अध्यात्म है । द्रव्यसंग्रह ग्रन्थराज में आचार्य नेमिचन्द सिद्धांती देव कहते हैं ” मा चिट्ठह मा जंपह मा चिन्तह किंवि जेण होइ थिरो ” अर्थात् कुछ भी चेष्टा मत करो, बोलो मत चिन्तन (विचार) मत करो जिससे स्थिर हो सको। यह करना बहुत कठिनतम प्रतित होता है? क्योंकि इसमें सब कुछ रूक जाता है और जहाँ सब कुछ रूक जाता है वहाँ इस जीव को आनन्द नही आता है। आज अध्यात्म पढना बहुत आसान हो गया है लेकिन अर्थ की ओर दृष्टि नहीं जाने से सब गड़बड़ हो रहा है। अर्थ निकालना इतना आसान नही है।
अध्यात्ममय जीवन चर्या का विषय
अध्यात्ममय जीवन मात्र चर्चा का नही बल्कि चर्या का विषय है। आज जगह-जगह आध्यात्मिकता परोसी जा रही है और अध्यात्म का विवेचनकर्ता शैली आदि का ऐसा आलम्बन लेते है जैसा कि सिद्ध अवस्था का पूरा अनुभवन हो रहा हो । मात्र ख्याति, पूजा और लाभ को लक्ष्य में रख कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। बस इतना ही अध्यात्म है उनके जीवन मे। मन के लड्डु को लड्डु नही माना जाता है, इतना तो ध्यान रखो। कहते भी हैं “अधजल गगरी छलकत जाय” अर्थात् ज्ञान कम प्रदर्शन ज्यादा। आचायों ने स्पष्ट विवेचन दिया है कि अध्यात्म की चर्चा अलग वस्तु है और चर्या अलग वस्तु है। बगैर वस्तु तत्त्व को जाने, उसका अनुपालन असम्भव है। जिसके जीवन में वैराग्य कि एक कणिका तक नहीं और वे अध्यात्म के प्रस्तोता बने बैठे है।
आत्मा के आधार के स्वरूप को जानें
आत्मा की चर्चा के पहले हमे इसके आधार के स्वरूप को सही तरह से जानना होगा। बिना आधार के आधेय की कल्पना नही कि जा सकती है। आचार्य कहते है जीव दो प्रकार के है संसारी और मुक्त। हम संसारी है और संसारी सशरीर होता है। इसलिये बगैर शरीर अर्थात् काय के स्वभाव को जाने हम आत्म तत्त्व को नही जान पाएंगे। बिना आधार को जाने आप आधेय तक नही पहुच सकते। जिस प्रकार वृक्ष के लिये आधार भूमि है और वृक्ष आधेय है। उसी प्रकार शरीर आधार है आत्मा आधेय हैं। आचार्य उमास्वामी जी का कथन है जो तत्त्वार्थ सूत्र के रूप में प्रसिद्ध है। जगत् अर्थात् संसार के और काय अर्थात् शरीर के स्वभाव की भावना संवेग और वैराग्य के लिये कि जाती है। जगत् के स्वभाव का चिन्तन करने से संसार से संवेग होता है। संसार और पाप से भीति और धर्म में प्रीति ही संवेग है। काय का स्वभाव जैसे यह शरीर अनित्य हैं, दुखों का कारण है, निस्सार है अशुचि है इत्यादि। इस प्रकार काय के स्वभाव का चिन्तन करने से विषयों से आसक्ति हटकर वैराग्य उत्पन्न होता है। जो संसार, शरीर विषय भोगो से विरक्त है। वही जीव अपने वैराग्य को दृढ़ बनाते हुये अध्यात्म को प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकता है। वरना वह वैराग्य और अध्यात्म किसी काम का नहीं।













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