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आचार्य श्री का 57 वां दीक्षा दिवस एवं आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माताजी का 33वां दीक्षा दिवस मनाया गया : आचार्य भगवन ने हर किसी को दिल खोल कर दिया है- आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माताजी


जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का 57 वां मुनि दीक्षा दिवस एवं आर्यिकारत्न मां श्री आदर्शमति माताजी का 33वां दीक्षा दिवस ,आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माता जीके ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, आचार्य छत्तीसी महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन हुई। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


कुंडलपुर (दमोह)। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में विश्व वंदनीय युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का 57 वां मुनि दीक्षा दिवस एवं आर्यिकारत्न मां श्री आदर्शमति माताजी का 33वां दीक्षा दिवस ,आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माता जीके ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, आचार्य छत्तीसी महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन हुई। 57 दीपों से आचार्य श्री की महा आरती की गई। इस अवसर पर आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माताजी ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज के दिन ही आचार्य विद्यासागर युग का सृजन हुआ था।

विद्यासागर युग का सृजन करने वाले गुरु नाम गुरु श्री आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज, सृजन मतलब दीक्षा ,दीक्षा का मतलब संकल्प। अषाढ़ सुदी पंचमी को सन 1968 में ब्रह्मचारी विद्याधर मुनि विद्यासागर जी बन गए थे गुरु नाम गुरु ज्ञानसागर जी महाराज जी इनको बनाने वाले और समयसार जैसे महान ग्रंथ को जीवंत बनाने वाले ,मूलाचार ग्रंथ को जीवंत बनाने वाले युगद्रष्टा गुरु नाम गुरु ज्ञानसागर जी महाराज थे। आज आचार्य भगवन का 57 वां दीक्षा समारोह है। सब कुछ है लेकिन सब कुछ नहीं भी है जिसके लिए जिसके द्वारा यह धरती फूल रही थी फल रही थी धरती में धर्म पल्लवित हो रहा था ।

वो आज कहीं भी नहीं है यहां परंतु फिर भी हम कैसे भूल सकते हैं हमें भूलना भी नहीं है। आज भी आचार्य श्री जी हर दिल में विचरण कर रहे हैं किसी ने कहा है पत्थर कट सकता है कागज फट सकता है कागज पर लिखा नाम कट सकता है पत्थर पर लिखा नाम कट सकता है लेकिन जिसके हृदय में आचार्य श्री का नाम लिखा है वह किसी भी भव में कभी नहीं मिट सकता है ।वह ऐसे ही थे वह ऐसे ही इस धरती में रहे वह कभी किसी को बोझ नहीं बने वह कभी किसी को भारी नहीं बने बल्कि वह जहां भी विचरण करते थे वहां की धरती फलीभूत हो जाती थी वहां की धरती प्रसन्नता से भर जाती थी।

ऐसे परम पूज्य आचार्य भगवन हम सभी के लिए बड़े बाबा के दरबार में बहुत विशेष रूप से याद आ रहे हैं ।वैसे तो लगभग पांच माह पूरे होने को हैं ।आचार्य भगवन हम सबको छोड़कर चले गए ।हमें वह दृश्य याद आ रहा है जब राम को कैकई ने 14 वर्ष का वनवास दिया। राम जब अयोध्या छोड़कर जा रहे थे तो अयोध्या वासियों ने राम को रोकने की कोशिश की राम नहीं रुके। उनके साथ-साथ पहुंचे लोग सरयू तट के पास उन्होंने रात्रि व्यतीत की रात्रि व्यतीत की तो वह ब्रह्म मुहूर्त में ही सबको सोता छोड़ कर चले गए। ऐसे ही आचार्य श्री सबके दिल में वास करते थे सब की आंखों में विचरण करते थे सबके मन में छाए थे ।सब सोचते थे अब आचार्य श्री का दीक्षा दिवस मनाने कहां जाएंगे आज हर किसी का मन कहां जाए आचार्य श्री को कहां खोजें आचार्य श्री हमें कहां मिलेंगे ।

हमने सोचा बड़े बाबा के दरबार में आचार्य श्री मिलेंगे ।क्योंकि आचार्य श्री के 25 वें रजत महोत्सव पर हमें भी आचार्य श्री के कर कमल से पांच महाव्रत को धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। 32 वर्ष व्यतीत हुए 32 वर्षों में ना आचार्य श्री का सानिध्य मिला 33वें वर्ष में प्रवेश करते हुए बड़े बाबा तो मिले हैं लेकिन आचार्य श्री नहीं मिले। आचार्य श्री ने हर किसी को दिल खोल कर दिया है।

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