समाचार

मार्गदर्शक, रक्षक और आध्यात्मिक गुरु भी होता है पिता: प्रकृति का पालक होने के साथ ही धैर्यता की प्रतिमूर्ति 


कहने को सभी धर्मों में पिता को ईश्वर से भी अधिक सम्मान दिया जाता है, क्योंकि वह सृजक है। वह बनाता है और उनके ही इस कर्म से प्रकृति का संतुलन होता है। जैन धर्म में भी पिता को मार्गदर्शक, रक्षक और आध्यात्मिक गुरु की पदवी से विभूषित किया गया है। 15 जून को पूरा विश्व पितृ दिवस मना रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…स्रोत धर्मग्रंथ


इंदौर। जैन धर्म में पिता का महत्वपूर्ण स्थान है। पिता को न केवल पारिवारिक रिश्तों में प्रेम और सम्मान का प्रतीक माना जाता है बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक, रक्षक और आध्यात्मिक गुरु के रूप में भी देखा जाता है। पिता को परिवार का मुखिया माना जाता है, जो अपने बच्चों को सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन और प्रेरित करते हैं और उनकी रक्षा भी करते हैं। पिता परिवार में अनुशासन और प्रेम का संतुलन बनाए रखते हैं। वे बच्चों को नियमों का पालन करना सिखाते हैं और साथ ही उन पर स्नेह भी बरसाते हैं। कुछ जैन परंपराओं में पिता को आध्यात्मिक गुरु के रूप में भी देखा जाता है, जो बच्चों को धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जैन धर्म में पिता को संतोष और संतुष्टि का प्रतीक माना गया है, जो अपने बच्चों को खुशी और संतुष्टि प्रदान करते हैं।

जैन धर्म में ही पिता को एक मौन साधक के रूप में भी देखा जाता है, जो बिना किसी दिखावे के अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं और अपने परिवार के लिए त्याग करते हैं। एक पिता का व्यक्तित्व शांत, सहज और धैर्यवान होता है। वह हर परिस्थिति में शांत रहते हैं और अपने परिवार को सही दिशा दिखाते हैं। पिता अपने परिवार के लिए बहुत त्याग करते हैं और अपने सुख-दुःख को भूलकर उनकी जरूरतों को पूरा करने में लगे रहते हैं। संक्षेप में, जैन धर्म में पिता का महत्व बहुत अधिक है। उन्हें एक मार्गदर्शक, रक्षक, आध्यात्मिक गुरु और प्रेम व सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

पिता मार्गदर्शन और बलिदान संस्कारों से जुड़ा हुआ है

पिता का उल्लेख ग्रंथ में सम्पत्ति के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में किया गया है, विशेष रूप से पुत्रों की अनुपस्थिति में। पिता वह है जो लड़के को इतनी सम्पत्ति का स्वामी बनाता है कि वह श्रेष्ठ वस्तु का दान कर सके तथा वह गुरु भी है। इस व्यक्ति का उल्लेख शूद्र पुत्र को संपत्ति देने के संदर्भ में किया गया है तथा इस कार्य से संबंधित नियमों को ग्रंथ में रेखांकित किया गया है। पिता प्रजापति का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे ग्रंथ में दी गई टिप्पणी के अनुसार हिरण्यगर्भ भी कहा जाता है। पिता वह व्यक्ति है जिसे श्राद्ध में सबसे पहले पिंड अर्पित किया जाता है तथा अर्पण का क्रम नियम द्वारा तय किया जाता है, जैसा कि ग्रंथ में उल्लेख किया गया है। पिता की अवधारणा विभिन्न धर्मों और परंपराओं में भिन्न है। बौद्ध धर्म में पिता का अर्थ उन लोगों से है, जो धन नहीं रखते हैं।

हिंदू धर्म में यह अनुष्ठानों के दौरान सम्मानित पूर्वजों की आत्माओं को शामिल करता है, जो वंश और मार्गदर्शन को दर्शाता है। जैन धर्म पिता को भविष्यवक्ता की भूमिकाओं और पारिवारिक कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करके प्रस्तुत करता है। दक्षिण एशियाई आख्यान पिता और उनके बच्चों के बीच जटिल संबंधों को दर्शाते हैं। विभिन्न संदर्भों में यह शब्द अधिकार, मार्गदर्शन और बलिदान संस्कारों से जुड़ा हुआ है। अंततः पिता एक महत्वपूर्ण पारिवारिक और आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page