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...तो जाओ तुम्हारी जिंदगी में खुशियों की बौछार बनी रहेगी: मुनिश्री के प्रवचनों का धर्मलाभ ले रहे हैं धर्मावलंबी श्रद्धालु


निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के धर्मावलंबी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थित रहती है। सोमवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन के दर्शन को लेकर महत्वपूर्ण बातों से जैन समाज के श्रद्धालुओं को लाभान्वित किया। पढ़िए उनके प्रवचनों के खास अंशों को इस खबर में…


सागर। जिन्होंने अपने जीवन को इतना संस्कारित और साधनामय बनाया। वह भले ही हजारों लाखों साल पहले मोक्ष चले गए लेकिन जिस रास्ते से वे गुजरे, उन रास्तों पर उनके चिन्ह आज भी विद्यमान हैं और उनकी आदर्शताओं को ध्यान में रखकर उनके आचरण को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए जिनेंद्र देव की स्थापना करते हैं क्योंकि, इस कलयुग में और खासतौर से श्रावक उपादान कृत धर्म से अपना जीवन नहीं चला पाता, उसके उपादान में इतनी ताकत नहीं होती कि वह अपनी इच्छानुसार जीवन जी सके। वह अपने ही जीवन के सुख-दुःख से सुखी दुःखी नहीं होता, उसके साथ उसका परिवार भी है, रिश्तेदार, समाज भी है। यह उद्गार मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इन सारी परिस्थितियों में गृहस्थ कैसे अपने जीवन को इस कठिन मोड़ या कठिन संसार से सकुशल निकाल ले जाए, इसके लिए ही जिनवाणी ने श्रावकों को जिनेंद्र देव और जिनेंद्र पूजा का उपदेश दिया और गृहस्थ से कहा कि तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम्हारी जिंदगी में कभी आंसू न आए। तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम्हारा चेहरा सदा मुस्कुराता रहे। तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम घोषणा कर सको कि मेरी जिंदगी में कभी विपरीत समय नहीं आएगा। तब जिनवाणी ने एक सूत्र तुम्हें दिया कि तुम एक काम करो-दुनिया में जिसको कभी दुःख न हुआ हो, जिसकी जिंदगी में हमेशा सुख ही सुख रहा हो और दुःख भी आया है तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। ऐसे लोगों की खुशी में शामिल हो जाओ, तुम्हारी जिंदगी खुशमय हो जाएगी। ऐसी महान आत्माओं के दुःख को दूर करने का भाव करो, तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा।

भगवान का पंचकल्याणक होगा तो हम उसमें पात्र बनेंगे

यदि तुम चाहते हो कि मेरी जिंदगी में कोई संकट आए तो वह टल जाए तो तुम अपनी जिंदगी में एक मंत्र ले लेना-जो मुझसे बड़े हैं, मैं उनकी जिंदगी में कभी संकट नहीं आने दूंगा। यदि मेरे हाथ में है तो कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यदि तुम अपनी जिंदगी में अपने परिवार में खुशहाली चाहते हो तो दूसरा नियम तुम्हें लेना है, जो तुम्हारी महान आत्मा हो, जिसको तुम सर्वश्रेष्ठ मानते हो, उसकी खुशी में तुम सदा शामिल रहोगे। जाओ तुम्हारी जिंदगी में खुशियों की बौछार बनी रहेगी। क्यों मनाते हैं जयंतियां, क्यों मनाते हैं पंचकल्याणक, मूल भगवान के पंचकल्याणक से हमें कोई लेना देना नहीं लेकिन, नीति है जो व्यक्ति अपने आदर्श की खुशियों में शामिल होता है, उसकी जिंदगी अपने आप खुशमय हो जाती है। क्या तुम कभी भगवान के महोत्सव में शामिल हुए, क्या तुमने कभी भगवान के लिए धन कमाया कि भगवान का पंचकल्याणक होगा तो हम उसमें पात्र बनेंगे।

…तो भगवान तुम्हारे लिए समर्पित रहेगा

यदि नहीं तो वे कभी उम्मीद न करें कि इस दरवाजे से कभी तुम्हें कोई खुशी मिल जाएगी क्योंकि, टीट फॉर टैट, तुम भगवान के लिए समर्पित रहोगे तो भगवान तुम्हारे लिए समर्पित रहेगा। जब तुम समर्थ थे तब तुमने उसकी कद्र नहीं की इसलिए कर्म ने आज तुम्हें असमर्थ बना दिया। जो आज कुल से, जाति से, परिवार से, काल से समर्थ हैं इसके बाबजूद भी तुम्हारा मन भागीदारी में न हो तो नोट कर लेना कि कल तुम इतने असमर्थ हो जाओगे कि चाहते हुए भी कर नहीं पाओगे क्योंकि, तुमने समर्थ होकर नहीं किया।

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