आचार्य वर्धमान सागर जी ने टोंक चातुर्मास प्रवचन में कहा कि साधु का जीवन आगम अनुसार होना चाहिए। समाज को संगठित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रथमाचार्य शांतिसागर जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने संतवाद और पंथवाद से ऊपर उठकर एकता का आह्वान किया। संगोष्ठी में विद्वानों ने भी प्राचीन परंपरा को अक्षुण्ण रखने पर बल दिया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की ख़ास रिपोर्ट…
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी टोंक में चातुर्मास हेतु संघ सहित विराजित हैं। प्रवचन में उन्होंने कहा कि साधु के नेत्र आगम हैं और साधु को सदैव आगम के अनुसार जीवन जीना चाहिए। साधु का लक्षण परिग्रह रहित, कषाय रहित और स्वाध्याय प्रेमी होना चाहिए। समाज को जोड़ना हर साधु और हर व्यक्ति का कर्तव्य है। यदि समाज को जोड़ नहीं सकते तो तोड़ने का कारण भी नहीं बनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज के समय में समाज को संगठित करना अत्यंत आवश्यक है। प्रथमाचार्य शांतिसागर जी और अन्य आचार्यों के जीवन से यही प्रेरणा मिलती है कि “हम अपनी छोड़ेंगे नहीं और आपकी बिगाड़ेंगे भी नहीं।” यह सूत्र 57 वर्षों के संयम जीवन में उन्होंने अपनाया है और शिष्यों को भी यही संदेश देते हैं।
प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव की गोष्ठी में आचार्य वर्धमान सागर जी ने कहा कि आगम 400 वर्षों से भी अधिक पुराना है, इसलिए साधुओं व समाज को प्राचीन परंपराओं में बदलाव नहीं करना चाहिए। बदलाव समाज में विवाद और विघटन लाता है। साधु का जीवन उदासीनता, स्वाध्याय और आत्मविद्या पर आधारित होना चाहिए।
चंदन व पुष्प अर्पित करना आगम अनुकूल
संगोष्ठी में विद्वानों ने आलेख प्रस्तुत किए और कहा कि भगवान को चंदन व पुष्प अर्पित करना आगम अनुकूल है। इस अवसर पर अतिथियों ने आचार्य श्री का चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। कार्यक्रम में श्रीफल, माला और शाल से सभी विद्वानों का सम्मान किया गया।
आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव पूरे भारत में वर्ष 2024-25 तक मनाया जा रहा है। 23-24 अगस्त को आयोजित गोष्ठी में देशभर के ख्याति प्राप्त विद्वानों ने आचार्य शांतिसागर जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और जैन धर्म में योगदान पर विचार रखे। संगोष्ठी में शांति सागर जी के तप, त्याग, संयम, समाधि और दिगम्बर परंपरा के संरक्षण पर विस्तृत चर्चा हुई।













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