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समस्याएं आती हैं तो जाने के लिए...: मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने धर्मसभा में सुख और दुख में बताया व्यापक अंतर 


आचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्रुतसागर जी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चातुर्मास रत होकर विराजित हैं। यहां पर नित पूजन अभिषेक के बाद धर्मसभा का आयोजन हो रहा है। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


नांद्रे। आचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्रुतसागर जी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चातुर्मास रत होकर विराजित हैं। यहां पर नित पूजन अभिषेक के बाद धर्मसभा का आयोजन हो रहा है। इसमें मुनि श्री सारस्वत सागरजी ने प्रवचन में कहा कि जीवन में प्रत्येक प्राणी किसी न किसी समस्या से जूझ रहा है। कभी संबंधांे में दरार पड़ती है। कभी शरीर रोग का घर बन जाता है, कभी लक्ष्मी जी रूठ जाती हैं, कभी सरस्वती दूसरे रास्ते पर चली जाती हैं, कभी योग्यता रहती है तो सामग्री नहीं रहती, कभी सामग्री रहती हैं तो योग्यता नहीं रहती। इस प्रकार अनेक समस्या हैं, जो जीव को दुखी करने में अपनी जी जान लगा के रहती हैं परंतु, ज्ञानी पुरुष इन समस्याओं के आने पर भी अपने विचारों में उसको स्थान नहीं देता है। मुनिश्री ने कहा कि वह जानता है कि आता है जो, सो वह जाता है।

आने के पूर्व जो था वही जाने के बाद होना है तो विकल्प करके अपनी संकल्प शक्ति को कम मत करना। समस्या संकल्प शक्ति को कम करने के लिए आती हैं परंतु, ज्ञानी पुरुष इन समस्याओं के आने पर अपनी संकल्प शक्ति को कम नहीं करता। इसलिए वह दुःखी नहीं होता और जो कम कर देता है। वह दुखी हो जाता हैं। जिसको आप दुख मानते हो उसको कोई सुख मानता है। जिसे आप सुख मानते हो, उसे कोई दुख मानता है। दुख हमारी विचार कि धारा में है, हमारी अस्वीकृति में है। सुख हमारी विचार धारा में है, हमारी स्वीकृति में है।

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