आचार्य श्री विमर्शसागर जी इस वर्ष के मंगल चातुर्मास के लिए धर्मनगरी सहारनपुर की ओर निरंतर पद विहार कर रहे हैं। मुजफ्फर नगर में जब से आचार्य संघ के आने की खबर मिली, तभी से संपूर्ण नगर में अभूतपूर्व उत्साह, भक्ति देखी जा रही है। शनिवार को आचार्य चतुर्विध संघ पदविहार करते हुए सुरेंद्र नगर कालोनी में पधारे। सुरेंद्रनगर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…
सुरेंद्रनगर। मुजफ्फरनगर में 50 वर्षों के अंतराल बाद विशाल चतुर्विध संघ आचार्य पधारे। श्री भक्त समूह में जब-जब भक्ति की उत्तुंग लहरें उठती हैं तब-तब निर्ग्रन्य दिगंबर संतों के चरण रूपी सरिताएं उन भक्तसमूह की ओर बढ़ ही जाती हैं। आचार्य श्री विमर्शसागर जी इस वर्ष के मंगल चातुर्मास के लिए धर्मनगरी सहारनपुर की ओर निरंतर पद विहार कर रहे हैं। मुजफ्फर नगर में जब से आचार्य संघ के आने की खबर मिली, तभी से संपूर्ण नगर में अभूतपूर्व उत्साह, भक्ति देखी जा रही है। 17-18 जून को आचार्य ससंघ अतिशय क्षेत्र वहलना तथा 19-20 जून को प्रेमपुरी मुजफ्फर नगर में रहे। शनिवार को आचार्य चतुर्विध संघ सहित प्रातः काल की मंगल बेला में पदविहार करते हुए सुरेंद्र नगर कालोनी में पधारे। भक्तों ने आचार्य संघ की पलक-पांवड़े बिछाकर भव्यातिभव्य मंगल अगवानी की।
तेरा लक्ष्य भगवान बनने का है
सुरेंद्रनगर कॉलोनी में धर्मसभा में आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि जो गुरु दर्शन पाता है, मन उसका हर्षाता है। गुरु दर्शन गुण दर्शन है, वो गुणमय हो जाता है। गुरु गुण अभागी हो-हो-२, प्रभु गुणों को पाए रे… जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन की हमारी यह यात्रा भगवान बनने की है। इस यात्रा में हमारा सबसे पहला परिचय होता है गुरु से। गुरु ही हमें बताते हैं कि बेटा ! तेरा लक्ष्य भगवान बनने का है, बेटा। भगवान बनने के लिए ही तू इस मानव पर्याय में आया है। गुरु ही बताते हैं, भगवान का स्वरूप क्या है और तेरे अंदर भी भगवान बीज की तरह विद्यमान हैं। यह भी सद्गुरु ही हमें बताते हैं। हम सबके परम उपकारी, कल्याणकारी होते हैं। परम दिगम्बर वीतरागी संत गुरुवर। बंधुओ! आप जीवन भर अपने परिवार की चिंता में गंवा देते हैं और विचार करते हैं कि पूरे परिवार को भी मेरी चिंता रहती है। किन्तु ध्यान रखना, आपके परिवारी जन आपके नश्वर शरीर की चिंता कर सकते हैं किन्तु आपके अविनाशी शाश्वत आत्मा की चिता यदि किसी को है तो वे एकमात्र सद्गुरु ही हो सकते हैं।
सुख स्वरूप मोक्ष स्थान में स्थापित कर दूं
निर्ग्रन्थ वीतरागी दिगम्बर गुरु सदाकाल यह भावना-चितवन करते हैं कि ष्इस संसार में यह जीव दुःखों को भोग रहा है, मैं कब इसे इन दुःखों से निकालकर सुख स्वरूप मोक्ष स्थान में स्थापित कर दूं। बंधुओ ! आज आप सद्गुरु के न्यरगों में बैठकर जिनेंद्र भगवान की वाणी सुन रहे हैं तो विश्वास करिये कि अब आप भी निकट भविष्य में स्वयं ही भगवान बनने वाले हैं। आपका पुष्प था हमारा योग बना, बस यह संयोग आज बन गया है। गुरु जनों का संयोग भव्य जीवों के भाग्य से ही प्राप्त होता है।













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