दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -138 सच्चा सुख आत्मबोध, भक्ति, वैराग्य और शांति में है : जागो, इससे पहले कि काल का मुख तुम्हें भी निगल जाए


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 138वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


झूठे सुख को सुख कहे, मानता है मनमोद।

जगत चबेना काल का, कुछ मुख में गोद॥


भावार्थ और व्याख्या:

कबीर दास जी इस दोहे में मनुष्य की मोहग्रस्त मनोवृत्ति और क्षणिक सुखों के प्रति उसकी अंधी आसक्ति पर तीखी टिप्पणी करते हैं।

वे कहते हैं कि मनुष्य झूठे, भौतिक और अस्थायी सुखों को ही सच्चा सुख मान बैठा है।

उसका मन इन तात्कालिक विलासों में इतना लिप्त है कि सच्चे सुख, अर्थात आत्मिक शांति और परम सत्य, की ओर ध्यान ही नहीं जाता।

यह मन ‘मोद’ — अर्थात बाहरी आकर्षणों में इतना मस्त है कि उसे सच्चे सुख की खोज की आवश्यकता भी नहीं लगती।

कबीर चेताते हैं कि सारा संसार मृत्यु (काल) के लिए एक ‘चबेना’ मात्र है,

जिसे वह धीरे-धीरे चबाकर निगलता जा रहा है।

हम सोचते हैं कि हमारे पास समय है, लेकिन काल का मुख हर क्षण खुला है, और यह संसार बस उसमें समाने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वास्तविक सुख कहां है?

मनुष्य जिसे सुख समझ रहा है —

भोग-विलास, संपत्ति, सोशल स्टेटस, मोबाइल, फैशन, घर-गाड़ी —

ये सब मृगमरीचिका हैं।

जैसे मृग रेगिस्तान में दूर से जल देखता है और भागता रहता है,

वैसे ही मनुष्य भी इन झूठे सुखों के पीछे भागते हुए थकता है, टूटता है, पर तृप्त नहीं होता।

कबीर की चेतावनी:

जब तक मनुष्य यह मूल प्रश्न नहीं पूछता —

“मैं कौन हूं?”,

तब तक वह मृत्यु के जाल में फंसा रहेगा।

शरीर, संबंध और संसार — ये सब नश्वर हैं।

फिर भी हम इन्हीं में सुख खोजने की भूल कर रहे हैं।

“जगत चबेना काल का” — यह पूरी दुनिया काल की थाली में परोसी हुई है, और काल हर क्षण उसे निगल रहा है।

धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश:

धर्म हमें सिखाता है कि

सच्चा सुख आत्मबोध, भक्ति, वैराग्य और शांति में है।

जब मनुष्य झूठे सुखों की तलाश छोड़कर अंतर्मुखी होता है,

तभी वह नश्वरता से ऊपर उठकर अमर तत्व को पहचानता है।

कबीर कहते हैं —

जो सुख आज तुम ‘सुख’ मान रहे हो,

वह केवल मन की चंचलता और भ्रांति है।

जागो, इससे पहले कि काल का मुख तुम्हें भी निगल जाए।

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