दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 136वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
जहां ‘मैं’, वहां आपदा; जहां संशय, वहां रोग।
कहें कबीर — ये क्यों मिटें? ये चार बाधक रोग॥
कबीर दास जी कहते हैं कि जहां ‘मैं’ की भावना, अर्थात अहंकार होता है, वहां दुःख, संकट और विनाश का जन्म निश्चित है।
और जहाँ संशय होता है — चाहे वह ईश्वर में हो, अपने मार्ग में हो या किसी व्यक्ति में — वहां मन अशांत हो जाता है और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।
जब तक मनुष्य इन चार मानसिक विकारों —
अहंकार, संशय, लोभ और मोह — से ग्रस्त रहेगा,
तब तक न तो उसे शांति प्राप्त हो सकती है, और न ही वह सत्य तक पहुंच सकता है।
कबीर प्रश्न करते हैं — ये रोग कैसे मिटें?
उनका उत्तर स्पष्ट है — ज्ञान, भक्ति और आत्म-निरीक्षण ही इसका उपाय हैं।
जब तक ये बुराइयां भीतर विद्यमान हैं,
तब तक समाज में प्रेम, सद्भावना, और स्थायित्व की कल्पना भी व्यर्थ है।
धर्म कहता है — “अहं ब्रह्मास्मि”, अर्थात मैं ब्रह्म हूँ,
लेकिन इसका अर्थ अहंकार से नहीं, आत्मबोध से है।
जब मनुष्य ‘मैं’ को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है,
तभी विनम्रता, करुणा, और शुद्ध भक्ति का जन्म होता है।
जहां अहंकार है, वहां आपदा निश्चित है।
जहां संशय है, वहां रोग और अशांति का वास है।
कबीर चेतावनी देते हैं — जब तक हम इन चार दुर्गुणों को भीतर से नहीं मिटाते,
तब तक न आंतरिक शांति संभव है, और न ही सत्य का साक्षात्कार।













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