महान आत्माएं एक वो होती है जो महान गुणों को धारण करती हैं, दूसरी वे आत्मायें होती है जिन्हें दुनिया के हर जीव में महानता दिखती है। ऐसे ही सज्जन आदमी भी होते हैं जो दुर्जनता से रहित होते हैं लेकिन कुछ सज्जन ऐसे होते है जिनकी दृष्टि में स्वयं तो दुर्जन नजर आता है और सारा जगत सज्जन नजर आता है। ऐसी जो दूसरे नम्बर की महान आत्माओं की परिभाषा है वह बड़ी विचित्र है- स्वयं गुणवान होकर गुणहीन की अनुभूति, ऐसी आत्माये तीर्थंकर भगवान बनने का अधिकार रखती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
सागर। महान आत्माएं एक वो होती है जो महान गुणों को धारण करती हैं, दूसरी वे आत्मायें होती है जिन्हें दुनिया के हर जीव में महानता दिखती है। ऐसे ही सज्जन आदमी भी होते हैं जो दुर्जनता से रहित होते हैं लेकिन कुछ सज्जन ऐसे होते है जिनकी दृष्टि में स्वयं तो दुर्जन नजर आता है और सारा जगत सज्जन नजर आता है। ऐसी जो दूसरे नम्बर की महान आत्माओं की परिभाषा है वह बड़ी विचित्र है- स्वयं गुणवान होकर गुणहीन की अनुभूति, ऐसी आत्माये तीर्थंकर भगवान बनने का अधिकार रखती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि स्वयं के लिए तो दुनिया कमाती है, कभी दूसरों के लिए कमाए, वो व्यक्ति महान में भी महान है। हम अभाव का उतना ही अनुभव करें जितना हम पा सकते है, ज्यादा अभाव का अनुभव करने से वर्तमान का सुख खत्म हो जाता है।उन्होंने कहा कि जो दूसरों की चिंता करता है वह अधम से भी अधम है इसलिए जैनदर्शन ने बहुत अच्छी कला दी कि तुम जो कुछ भी दूसरों के लिए करो उसमें धारणा बना लो, मैं दूसरे के लिए कुछ कर ही नही रहा हूँ, मैं तो सबकुछ अपने लिए कर रहा हूँ। मैं दूसरे को नमोस्तु भी कर रहा हूँ तो मैं नमोस्तु नही कर रहा हूँ, उच्च गोत्र का बंध कर रहा हूँ। मैं तुम्हे प्रवचन नही दे रहा हूँ, मैं तो अपना स्वाध्याय कर रहा हूँ, उपदेश एक स्वाध्याय में आता है, स्वाध्याय में सबसे ज्यादा अपने चिंतन की पुनरावृत्ति होती है, उसी कारण से असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।
कर्मों का क्षय जरूरी
मुनि श्री ने कहा कि जैसे दर्पण मैं देखने वाला कहता है कि जरा दर्पण देख लूं, सत्य यह नही है कि वह दर्पण नहीं देख रहा है, दर्पण में अपना चेहरा देख रहा है इसी तरह ज्ञानी व्यक्ति भगवान का दर्शन करता ही नहीं है, कहने में आ रहा है, वो तो भगवान की द्रव्य, गुण, पर्यायों में अपनी आत्मा को देखता है। उसने अपने मिथ्यादर्शन को सम्यक्त्व बनाने के लिए निधत्त निकाचित कर्म जो तपस्या से नही कट रहे थे, तो वह भगवान का दर्शन नही अपने निधत्त निकाचित कर्मो का क्षय करने मन्दिर जाता है। मैंने जो कर्म बान्धे है उन कर्मों का क्षय बिना भगवान के दर्शन के नही होगा इसलिए उसने अपने कर्मो के क्षय के लिए जिनमंदिर बनाया, अब कहा पर का उपकार है। जिस धर्म की क्रिया करने में थकान महसूस हो, विराम का भाव आए बस अब बहुत हो गया, समझ लेना वह धर्म हुआ ही नहीं। किसी भी धर्म की क्रिया चाहे पूजा हो, दान हो, प्रवचन हो, आपका व्रत हो, रात्रिभोजन का त्याग हो, दूसरो के ऊपर उपकार हो, इन सब मे थकान आने लगे, समझना तुमने धर्म किया ही नही है। धर्म कार्य के बाद तुम थके हुए नजर आते हो क्योंकि तुमने सब कुछ धर्म के लिए किया है और धर्म तुमसे भिन्न है, धर्म तो भगवानों का है, धर्म तो गुरु का है। आज इतना धर्म हो रहा है, इतना धर्म मैंने विगत 50 साल पहले नही देखा, कितने मन्दिर बन रहे, कितना दान हो रहा है, कितने कार्यक्रम हो रहे है लेकिन लाभ नही दिख रहा, मात्र तुम्हारे मन मे धर्म के लिए कुछ करने का मन हुआ है, उसमे तुम्हे अपने जीवन मे ऐसा महसूस नही हुआ कि मैं कुछ अपने लिए कर रहा हूँ। सारंग के समय तुम दुकान में थकते नही हो क्यों? वहाँ तुम्हे सीधा लाभ दिख रहा है। यहाँ प्रत्यक्ष लाभ नही दिख रहा है।
धर्म की क्रिया करो
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति जिस चीज को पसंद नहीं करता है, असमर्थ होता है, वह व्यक्ति उस चीज की बुराई करता है, स्वयं नहीं करेगा, दूसरे को भी नही करने देगा और जो करेगा उसकी बुराई करेगा, ये नेचर है सारी दुनिया का, ये चाणक्य नीति है। ऐसा करना गुण भी है और दुर्गुण भी। जब कोई बुरे कार्यो में लगाता है कि मैं नही कर रहा हूँ तो बेटे को भी नही करने दूँगा तो ये लक्षण अच्छा है, औषधि बन गया ये गुण। निंदा का, बुराई का गुण औषधि बन गया। बुरे कार्यों की बुराई करना भी धर्म है। अब अच्छे कार्य है, करना चाहता है लेकिन कर नही पा रहा है इसलिए वो बुराई करने लग जाता है। तुम्हारे पास झोपड़ी है और बाजू में मंजिल की मंजिल उठती जा रही तो तुम्हे क्या भाव आएगा, 99% ईष्या भाव। हम धर्म नहीं कर पा रहे है कोई बात नहीं, इसने किया है, जय जिनेन्द्र कर लो। मैं दान नहीं दे पा रहा, इसने दिया है जय जिनेंद्र कर लो। तुम मंदिर नहीं जाओ तो कोई बात नही, तुम्हारा पड़ोसी मंदिर जाता है, उसी को जय जिनेन्द्र कर लिया करो तो भी तुम्हारा बेड़ा पार हो जाएगा। पहले लोग शिखर जी नही जा पाते थे तो वे जो शिखर जी से लौटते थे उसकी अगवानी करते थे, उसकी वंदना शिखर जी की वंदना के बराबर मानते थे। मैं सबकुछ अपने लिए कर रहा हूं, ये सब मेरा ही कार्य है। भगवान का मंदिर नहीं बन रहा है, मेरा कार्य हो रहा है, मेरे कर्मों की निर्जरा का आलय बन रहा है, मेरी पूजा करने का स्थान बन रहा है, मुझे लाभ होगा, भगवान को कोई लाभ ही नहीं। प्रत्येक वस्तु के प्रत्येक धर्म की क्रिया पर अपनी आत्मा को स्थापित कर दो तो शरीर कितना ही थका हुआ दिखेगा लेकिन तुम्हारा उत्साह थका हुआ नही दिखेगा।













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