आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अपूर्व सागर ने चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए सत्संग को अच्छा इंसान बनाने की फैक्ट्री बताया। मुनिश्री ने कहा कि आत्मा बांस की टोकरी के समान है और धर्म श्रवण पानी की तरह है। धर्म श्रमण करने से पाप का मैल धुलता है, आत्मा नम्र बनती है और बुराइयों का नाश होता है। उन्होंने बताया कि भगवान की पूजन करने से स्वर्ग का सुख मिलता है।पढि़ए अशोक कुमार जेतावत की रिपोर्ट..
धरियावद। आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अपूर्व सागर ने चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए सत्संग को अच्छा इंसान बनाने की फैक्ट्री बताया। मुनिश्री ने कहा कि आत्मा बांस की टोकरी के समान है और धर्म श्रवण पानी की तरह है। धर्म श्रमण करने से पाप का मैल धुलता है, आत्मा नम्र बनती है और बुराइयों का नाश होता है। उन्होंने बताया कि भगवान की पूजन करने से स्वर्ग का सुख मिलता है। पापों का नाश होता है और आत्मा की शुद्धि होती है।
भगवान का आश्रय चाहिए लेना
संघस्थ मुनि श्री अर्पित सागर ने अपने प्रवचन में कहा कि इस जगत में केवल दुख ही दुख है। शाश्वत शांति नहीं है। इसलिए मनुष्यों को भव से रहित भगवान का आश्रय लेना चाहिए। ताकि इस संसार में बार-बार जन्ममरण नहीं करना पड़े। उन्होंने कहा कि तीन जगत में चिरकाल से यह जीव मिथ्यात्व और मायाचार से भ्रमण कर रहा है। संसार भावने के चितवन से भय पैदा होता है, तब मोक्ष पाने के उपाय में प्रवृत्ति होती है। मुनिश्री ने कहा कि नरक में उत्पन्न होने से हजारों बिच्छुओं के एक साथ डसने जितना दुख होता है। नारकीय जीव नुकीले शस्त्रों पर फुटबॉल की तरह उछलते हैं। नरक की भूमि पर सूर्य की किरणों समान तेज और नुकीली घास होती है।













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