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जिनेंद्र प्रभु की वाणी के साधक ही जैन कहलाते हैं: जैन वही कहलाते हैं जो जिनेन्द्र वाणी के उपासक हैं-आचार्य विमर्शसागर


जिनागम पंथ स्थापना दिवस मनाया गया जहाँ आचार्य विमर्शसागर ने कहा कि जिन्होंने स्वयं के मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करली है, संसार में अब जिन्हें कुछ भी जीतना शेष नहीं रहा है अर्थात संसार की सभी महा विभूतियां व देव भी जिनके श्री चरणों में नमस्कार करते हैं वे जिन कहलाते हैं। ऐसे जिनेंद्र भगवान के उपासक जैन कहलाते हैं। मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…..


एटा। जिनागम पंथ स्थापना दिवस मनाया गया जहाँ आचार्य विमर्शसागर ने कहा कि जिन्होंने स्वयं के मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करली है, संसार में अब जिन्हें कुछ भी जीतना शेष नहीं रहा है अर्थात संसार की सभी महा विभूतियां व देव भी जिनके श्री चरणों में नमस्कार करते हैं वे जिन कहलाते हैं। ऐसे जिनेंद्र भगवान के उपासक जैन कहलाते हैं। जैन धर्म के आद्य धर्मतीर्थ प्रवर्तक देवाधिदेव भगवान आदिनाथ हुए।

उनके ही प्रथम पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस भूमि का नाम भारत देश के नाम से विख्यात हुआ। उक्त उद्गार भाव लिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर महाराज ने जिनागम पंथ स्थापना दिवस के अवसर पर एटा नगर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उत्तर प्रदेश के एटा नगर में भावलिंगी संत, जिनागम पंथ प्रवर्तक आचार्य श्री विमर्श सागर महाराज के पावन सान्निध्य में जिनागम पंथ स्थापना दिवस हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया।

इस पावन एवम पुनीत अवसर पर नगर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। श्री जिनेंद्र प्रभु की भक्तिमय आराधना के साथ विशेष पूजा अर्चना की गई। कार्यक्रम के शुभारंभ में जिनागम पंथ का ध्वजारोहण किया गया। इस अवसर पर संघ के वरिष्ठ मुनिराज ने जिनागम पंथ के संदर्भ में बताया कि जैन धर्म अर्थात जिनागम पंथ अनादिकाल से इस धरा पर प्रवर्तमान रहा है तथा इसी तरह अनंत काल तक प्रवर्तता रहेगा। काल दोष के कारण इस पवित्र जैन धर्म में हीं अनेक मत -मतांतर पैदा हो गए हैं।

जिसके कारण अखंड जैन धर्म के अनुयायियों में भी आपस में अनेक मतभेद हो गए हैं। इस तरह अखंडित जैन समाज में भी अनेक विभाग दिखाई देते हैं। इस सब को देखकर पूज्य आचार्य श्री विमर्ष सागर जी महाराज को बिखरती जैन समाज को देखकर आंतरिक पीड़ा उत्पन्न हुई। पूज्य आचार्य श्री ने सभी जैन धर्मी श्रावकों को एकताबके सूत्र में बांधने के लिए “जिनागम पंथ जयवंत हो” का पावन पवित्र सूत्र प्रदान किया। जिसका सीधा सरल अर्थ है -भगवान जिनेंद्र प्रभु की वाणी में आया हुआ मार्ग ही सदा जयवंत हो। बंधुओं, स्वयं को जिनागम पंथी कहने से हम सीधे जिनेंद्र भगवान द्वारा बताए हुए सच्चे मार्ग से जुड़ जाते हैं।

वर्तमान में समय समय पर उत्पन्न हुए मत मतांतर सच्चे नही हो सकते। क्योंकि जिसका उदय होता है उसका नियम से अंत भी निश्चित है। अतः हम सभी सीधे जिनेंद्र प्रभु की वाणी से जुड़े और गर्व से कहें “हम जिनागम पंथी हैं”।

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