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वृहद श्री जिनसहस्त्र नाम स्त्रोत एवं भक्तामर मंत्र की आराधना : भक्ति हमेशा करें बिना स्वार्थ और व्याकुलता के – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर

भगवान महावीर के 2550वें निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष्य में आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री अनुश्रमण सागर जी के सानिध्य में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर विद्या पैलेस में वृहद श्री जिनसहस्त्र नाम स्त्रोत एवं भक्तामर मंत्र आराधना 51 परिवारों द्वारा की गई। इस अवसर पर मुनि श्री पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि भगवान की भक्ति बिना स्वार्थ के करनी चाहिए। स्वार्थ के साथ की गई भक्ति का फल नहीं मिलता। भगवान की भक्ति से अनंत-अनंत जन्मों के पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…



इंदौर
। भगवान महावीर के 2550वें निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष्य में आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री अनुश्रमण सागर जी के सानिध्य में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर विद्या पैलेस में वृहद श्री जिनसहस्त्र नाम स्त्रोत एवं भक्तामर मंत्र आराधना 51 परिवारों द्वारा की गई। इस विधान में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने 1527 मंत्रों की आहुति दी और अर्घ्य चढ़ाए। वहीं नौ श्रावकों द्वारा महाशांतिधारा की गई। इस अनुष्ठान का सौधर्म इंद्र बनने का लाभ शोभा-विनोद जैन परिवार को प्राप्त हुआ एवं इसके साथ ही 12 इंद्र और भी बनाए गए, जिन्होंने अनुष्ठान में आहुति दी। विधि-विधान मयंक जैन द्वारा किया गया।

भक्ति में होती है शक्ति

इस अवसर परअंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज में प्रवचन में कहा कि भगवान की भक्ति बिना स्वार्थ के करनी चाहिए। स्वार्थ के साथ की गई भक्ति का फल नहीं मिलता। भगवान की भक्ति से अनंत-अनंत जन्मों के पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। भगवान की भक्ति करते वक्त व्याकुलता नहीं होनी चाहिए। एक सेठ में भक्ति करते -करते पानी पीने की व्याकुलता हो गई तो वह मर कर मेंढक बना और एक मेंढक की भक्ति में व्याकुलता नहीं थी तो वह मेंढक मर कर देव बन गया। भक्ति में ही शक्ति होती है। आप इस शक्ति का सही उपयोग कर परमात्मा बनें।

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