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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : अहंकार और आलस्य पतन का भाव उत्पन्न करते है – आर्यिका विभाश्री


वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा के शांत समुंद्र में जो राग-द्वेष रूपी लहरें उठती हैं, यही हमारे पाप-पुण्य का बंध कराने वाली हैं। कर्म बंध के समय व्यक्ति हंस-हंस के कर्म का बंध तो कर लेता है और उदय के समय रोता है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा के शांत समुंद्र में जो राग-द्वेष रूपी लहरें उठती हैं, यही हमारे पाप-पुण्य का बंध कराने वाली हैं। कर्म बंध के समय व्यक्ति हंस-हंस के कर्म का बंध तो कर लेता है और उदय के समय रोता है। मोबाइल ने व्यक्ति को बहुत आलसी बना दिया है। पहले महिलायें स्वयं अपने घर का काम करती थीं और जरूरत पड़ने पर पड़ोसियों की सहायता भी कर देती थीं, परन्तु आज के दिनों में तो अपने कार्य को करने के लिये नौकर – नौकरानी की जरूरत होती है।

आलसी व्यक्ति काम करने से नहीं थकता, यदि काम करने का मन नहीं है और करना पड़े तो थक जाता है ।अपने बच्चे को इतना लायक मत बनाओ कि वे आपको नालायक समझने लगे। अहंकारी व्यक्ति फूल हो सकता है, लेकिन फैल नहीं सकता। अहंकारी व्यक्ति नेतृत्व नहीं कर सकता है। अहंकारी व्यक्ति किसी भी ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने के लिये उसे झुकना पड़ेगा और वह झुक नहीं सकता।

ज्ञान प्राप्त करने के लिये सबसे पहले विनम्र होना पड़ेगा। जो सुख की चाह करता है, वह विद्या को प्राप्त नहीं कर सकता। विद्या को प्राप्त करने वाला हमेशा विनयवान होता है जो गुरु के चरणों में बैठता है। जो लोग अपने से ज्यादा योग्यता वाले लोगों से ईर्ष्या करते हैं, निंदा करते हैं। अपने से ज्यादा ज्ञानी व्यक्ति का अपमान करते हैं, उन्हें ज्ञानावरणी कर्म का बंध होता है। जो व्यक्ति अपने से बड़े लोगों पर चिल्लाता है, क्रोध करता है, वह कभी महानता को प्राप्त नहीं करता। वह सफल व्यक्ति नहीं हो सकता। हम अपने से बड़ों का सम्मान करें तो हमारी उन्नति और सफलता के रास्ते खुले रहेंगे।

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