उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि परिवार में मां, पिता, भाई बहन, भाभी इत्यादि अगर अशक्त हैं और वह वंदना नहीं कर पा रहे हैं, अगर आप उन्हें तीर्थों की वंदना कराते हैं, आप धैर्य रखकर उनके पद से पद मिलाकर जिनेंद्र भगवान की मोक्ष स्थलीय पर उन्हें ले जाकर उन्हें दर्शन कराते हैं, तो इससे जो भाव विशुद्धि होगी और जो पुण्य कर्म बंधेगा वह आपकी अकेले में की गई वंदना से कहीं अधिक पुण्य आपको मिलेगा। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…
इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि…
1. आत्मा की शुद्धि हेतु आलोचना पाठ किया जाता है – आलोचना पाठ कभी भी पढ़ा नहीं जाता है। आलोचना पाठ किया जाता है। आपके दोषों के 25% कम हो सकते हैं अगर आप दोषों को स्वीकार कर लेते हैं। 25% पाप भगवान के सामने जाकर उन पापों को स्वीकार लेने से कम हो सकते हैं। 25% पाप प्रायश्चित करने से यानी माला, मौन, उपवास इत्यादि करके ,और इन पापों का ध्यान ना करने से विकल्प नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार 25% और आपके पाप नष्ट हो सकते हैं। यानी आलोचना करके आप शत प्रतिशत पापों की निर्जरा कर सकते है। किंतु ध्यान रहे यह ऊपरी- ऊपरी नहीं, आंतरिक रूप से आलोचना करने से होगा।
2. पाप कर्म की निर्जरा करने के लिए बहीखाते को रोज साफ करिए – भरत चक्रवर्ती को एक अंतरमुहूर्त में केवल्यज्ञान हो गया था। इतना बड़ा शासन, इतना वैभव होने के बाद भी एक अंतरमुहूर्त में मोक्ष हो जाने का मुख्य कारण था कि वे पल प्रतिपल उनके द्वारा किए गए प्रत्यक्ष व परोक्ष में पाप कर्मों की निर्जरा स्वयं की आलोचना करके करते रहते थे। इसलिए उनका कर्मों का बहीखाता रूपी हिसाब किताब बिल्कुल साफ था। ऐसे ही आप अपने बहीखाते को हमेशा साफ रखें ,क्योंकि आयु कर्म के बंध होने पर अगर यह खाता साफ नहीं हुआ तो निश्चित ही देव गति अथवा मनुष्य गति तो आपको प्राप्त नहीं होगी।
3. परिग्रह नंदी रौद्रध्यान – किसी भी प्रकार के व्यापार में बिना झूठ बोले बिना पाप किए हुए धन की अभिवृद्धि नहीं होती है। किंतु उस पाप की कमाई से झूठ की कमाई से आनंदित होना यह मानना कि मैंने आज उसको छल किया। और आनंदित होना। उस धन -वैभव को पाकर आनंदित होने से परिग्रह नंदी रौद्र ध्यान का दोष लगता है।
4. विषय संरक्षणा नंदी रौद्र ध्यान – सांसारिक विषयों में फंसकर दिन-प्रतिदिन पल प्रतिपल हमारी आकांक्षाएं दूसरों को देखकर यह होती है कि मेरे पास एक बड़ा घर हो, मेरे पास बहुत बड़ी-बड़ी जमीन हो, बड़ी-बड़ी कार हो। फिर घर में बड़ी कार आने पर बड़ी रंगीन टीवी आने पर बहुत आनंद मनाना, बहुत ज्यादा खुशी होना और इस परिग्रह से अत्यधिक आनंदित होना। विषय संरक्षण नंदी रौद्र ध्यान कहलाता है। याद रखिए अगर इस ध्यान में और इस आनंद की अवस्था में आपका आयु कर्मबंध हो गया तो निश्चित ही नरक के द्वार आपके लिए खुल जाएंगे। अतः चिंतन करें।
5. पापों की निवृत्ति हेतु पल प्रतिपल आलोचना करें – उन पापों को स्वीकार ना करें, उन्हें पलने ना दें उनका पोषण कदापि ना करें।
6. तीर्थ वंदना के दौरान हिंसा से बचें – वर्षा योग के दौरान परिवार सहित, इष्ट मित्रों सहित, हम विभिन्न तीर्थों की वंदना के लिए जाते हैं। उदाहरण के रूप में शिखर जी की वंदना करते समय हम अपने हाथों में लाठी लेकर सुबह 4:00 बजे से वंदना के लिए निकल जाते हैं। आप जब सीढ़ियों पर चल रहे होते हैं तो उस दौरान आपकी लाठी की मार से वहां पर दो इंद्रीय जीव जैसे लट और केंचुए उन सीढ़ियों पर होते हैं और उनकी हिंसा हो जाती है। आप की लाठी से उनके के दो टुकड़े हुए पीछे से कोई और आया तो उनके चार टुकड़े हो गए। इस प्रकार वो तड़पते रहते हैं। विवेक से कार्य करिए। यह आवश्यक नहीं है कि हम सूर्योदय के पहले वंदना करने निकल जाएं। विवेक से कार्य करिए क्योंकि आप महावीर के वंशज हैं जियो और जीने दो के सिद्धांत पर चलने वाले हैं। कहते हैं, सम्मेद शिखरजी की वंदना करने से अनंत जन्मों के पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं, किंतु अगर आपने विवेक से कार्य नहीं किया तो आप कर्मों को बांध लेंगे।
7. असक्तों को वंदना कराने का फल – परिवार में मां, पिता, भाई बहन, भाभी इत्यादि अगर अशक्त हैं और वह वंदना नहीं कर पा रहे हैं, अगर आप उन्हें तीर्थों की वंदना कराते हैं, आप धैर्य रखकर उनके पद से पद मिलाकर जिनेंद्र भगवान की मोक्ष स्थलीय पर उन्हें ले जाकर उन्हें दर्शन कराते हैं, तो इससे जो भाव विशुद्धि होगी और जो पुण्य कर्म बंधेगा वह आपकी अकेले में की गई वंदना से कहीं अधिक पुण्य आपको मिलेगा। कई बार यह देखा गया है कि बच्चे अपने मां बाप को वंदना नहीं करवाते हैं। किंतु याद रखिए जिस मा ने 9 माह तक बिना किसी शिकायत किए हुए बच्चे को पेट में रखा। वह बच्चे को पेट में रखकर सारे सांसारिक कार्यों को भी करती रही। धार्मिक कार्यों को भी करती रही। उसने कभी उफ तक नहीं किया, कोई शिकायत नहीं की। ऐसे मां का कर्ज हम कैसे चुका सकते हैं? किंतु जब तीर्थों की आप वंदना करवाते हैं तो निश्चित ही उनके किए गए उपकार की आप वात्सल्य स्नेहिल अनुमोदना करते हैं।
8. संसार रूपी बेल को तृष्णा फैलाती है – अपना व्यापार अच्छा चल रहा है, जिससे सांसारिक गतिविधियां सुव्यवस्थित चल रही हैं। धार्मिक गतिविधियां भी सुव्यवस्थित चल रही हैं। किसी प्रकार का दुख नहीं है, किंतु सब कुछ होने के बाद भी चक्रवर्ती की भी पूरी संपदा पाने की इच्छा, जैसे नवनिधि, 14 रत्न, 84 लाख हांथी ,18 करोड़ घोड़े और 6 खंड का आधिपत्य भी आपको कम लगने लगे तो समझ लेना कि संसार रूपी बेल याने तृष्णा ने आपको जकड़ रखा है। चिंतन करिए क्या यह इतना आवश्यक है।
9. संसार में भय किसका – आचार्य भगवान कहते हैं कि जीवों को सबसे अधिक भय मृत्यु का होता है। वे दरअसल में धन उपार्जन इसलिए करते हैं कि जब बुढ़ापा आएगा तो वह धन उनके काम आएगा। जब मृत्यु निकट होगी तो वेंटिलेटर लगाकर शायद मृत्यु से बच जाएंगे। किंतु ध्यान रखिए जब आयु बंध होगा तो इस शरीर को त्यागना ही होगा। और आप शरीर को अपना पड़ोसी माने शरीर आप नहीं है। वह आपकी तप साधना में सहयोगी मात्र है। आत्म उत्थान हेतु शरीर का प्रयोजन है। कभी भी मृत्यु से न डरें, क्योंकि मृत्यु कभी भी आपकी यानी आत्मा की नहीं होती है।
कार्यक्रम प्रभारी राकेश जैन पम्पू ने जानकारी दी कि प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से धर्म उदय की स्थली उदयनगर इंदौर में आचार्यकल्प श्री 108 विवेक सागर जी की ज्ञानमंदाकनी, आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज की ज्ञानसरिता भेदविज्ञानी आ. रत्न 105 श्री विज्ञानमती माता जी के बोध गम्य प्रवचन का लाभ लेने हेतु पधारें।













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